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प्रश्नोत्तर P6-0151 · भाग 6

ज्योतिर्लिंग और देवताओं में क्या संबंध है? दोनों एक ही श्रेणी में हैं या अलग अलग? दर्शन के बाद लाभ कब होता है, और यहाँ सत्संग या गुरु के शरण में किस हालत में आना चाहिए?

ज्योतिर्लिंग और देवता अलग अलग हैं। एक ही श्रेणी में नहीं हैं। ज्योतिर्लिंग निराकार ब्रह्म का स्वरूप है। बारह में से एक त्र्यंबकेश्वर में साकार हो गए, इसलिए वहाँ गड्ढा है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। बाकी ग्यारह जगह निराकार ब्रह्म का स्वरूप है। शिव है। लिंग मतलब पृथ्वी से जुड़ा है। वह ज्योति स्वरूप है। दर्शन के बाद क्या हो? बात यही है। दर्शन के बाद पूरी तरह बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ दोगे क्या? तब वहाँ से लाभ मिलने लगेगा। अगर दर्शन के बाद भी बेईमानी और दुष्कर्म कर रहे हो तो हानि होगी। जैसे एक आदमी सड़क पर शराब पिए, और एक आदमी गर्भगृह में जाकर किसी मंदिर में शराब पिए। दोष किसको लगेगा? इसी से समझ लो। बिना समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। वही आदमी शराब पी रहा है, दोनों पी रहे हैं। एक को दोष लग रहा है, एक को नहीं। दर्शन के बाद तुम क्या कर रहे हो, यही मायने है। नहीं तो दर्शन मत करो। जब वही काम करना है, बेईमानी करनी है, तो वहाँ मत जाओ। जाओगे तो जल्दी और ज्यादा तकलीफ होगी। लड़ना है तो ठीक है, वरना लाभ नहीं होगा। लाभ वाला काम क्या है आपका, और हानि होगी, और आप परेशान हो जाओगे, क्योंकि जितनी ऊर्जा मिलेगी उसे बेईमानी में खर्च करोगे। एक आदमी सौ रुपये कमाता था, शराब पीकर भी घर पहुँच जाता था। आपने उसे दो हजार दे दिए, तो क्या होगा? नुकसान होगा। पहले घर बहुत था, अब घर भी नहीं पहुँचेगा। कहीं गटर में पीकर लोट जाएगा। मारपीट खाएगा, सर फूटेगा। आपने उसका काम और बढ़ा दिया। सुबह इलाज कहाँ से कराएगा? इसलिए जितने पवित्र तीर्थ हैं, वहाँ तभी जाओ जब बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ना हो। नहीं तो मत जाओ। गुरु की शरण में भी तभी जाओ जब पूरी तरह बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ने के लिए तैयार हो। नहीं तो मत जाओ। समय बर्बाद मत करो। मैं यहाँ आने वालों को लाइव में बोलता हूँ। कुछ नहीं चाहिए तो यहाँ आना। कुछ चाहिए तो मत आना। बाद में कहोगे, कुछ मिला नहीं। मैं तो कह रहा हूँ, कुछ नहीं मिलेगा, सब खत्म हो जाएगा। पहले ही कहा था, कुछ नहीं चाहिए तो आना। चुपचाप बढ़िया से खाओ, और अपने आप में रहो। यहाँ बोलना भी मना है। कुछ नहीं चाहिए तो आना। पहले ही सचेत कर देता हूँ। फिर दो महीने बाद बोलो कि कुछ हुआ नहीं। पहले ही तो बोला था। बढ़िया से यहाँ जीने के लिए खाओ, एकांत में रहो। आने के लिए नहीं, छोड़ने के लिए आना। जो है वह छूट नहीं रहा, यहाँ रहोगे तो छूट जाएगा। मैं ऐसा रखूँगा कि छूट जाएगा। आप कुछ करने लायक भी नहीं रहोगे। ज्यादा दिन रुक गए तो बाहर जाकर करने लायक नहीं रहोगे। होगा तो ईमानदारी और सत्कर्म, नहीं तो कर ही नहीं पाओगे। हाथ काँपेंगे, पैर डगमगा जाएँगे। इसलिए कहता हूँ, ज्यादा दिन मत रुको। रुकोगे तो खत्म होना है। बाहर जाओगे तो ईमानदारी और सत्कर्म ही कर पाओगे। यहाँ रुक गए तो कर ही नहीं पाओगे। बेईमानी होगी नहीं। दिखावा हो ही नहीं पाएगा। सत्संग में एक बार बैठ गए तो देखो। मैं भी पानी पीने और बाथरूम नहीं जाता बीच में। आप उतना ही पानी पियो जितने में बाथरूम न लगे। गाड़ी का एवरेज निकालते हो, अपना भी एवरेज निकालो। उतना ही जल लो। सत्संग में बैठे हो तो सुबह से पानी मत पियो। सत्संग से उठो तब पानी पीना। हमें तो बोलना पड़ता है। जब सुबह से पानी नहीं पियोगे तो बाथरूम लगेगी ही नहीं। यह नहीं कर सकते तो सत्संग में मत बैठो। यह हॉस्पिटल थोड़े है। हॉस्पिटल के लायक हो तो वहाँ जाओ, इलाज कराओ। हम हॉस्पिटल खोलकर नहीं रखे। हम सत्संग करेंगे, तुम पानी पीने जाओगे, वह बाथरूम करने जाएँगे। ऐसा मत करो। लाइव सुनो। वीडियो सुनो। यहाँ आओ तो यहाँ के लायक बनकर आओ। नहीं तो मत आओ। भीड़ मत बढ़ाओ। उड़ीसा से दो लोग आए थे। एक शिक्षक था, एक उसका विद्यार्थी। वह बोला, मैं घर पर चार बार खाता हूँ। यहाँ तो बारह के बाद नाश्ता और उसके बाद एक बार भोजन। बोला, सुबह एक मुट्ठी चना दे दो तो मैं रुकता। मैंने कहा, रुको या न रुको, वह मैं नहीं दूँगा। बारह के बाद ही दूँगा। आना है तो यहाँ के लायक बनकर आना। व्यवस्थाएँ तुम्हारी वजह से नहीं बदलूँगा। बुजुर्ग हैं तो उन्हें दो समय देते हैं। कहने का मतलब, सत्संग में प्रेम में भक्ति में बैठो तो पूरी तरह बैठो। मैं आपके सामने वीडियो लगाकर कमरे में सोने नहीं चला जाता, और तुमसे कहूँ मत उठना। हम बोल रहे हैं, बोलने में बहुत ऊर्जा लगती है, प्यास लगेगी। और अपनी पत्नियों से करवा चौथ का व्रत करवाते हो, खुद बिना पानी रहे नहीं जाता। कुछ तो त्याग करना सीखो। दो चार घंटे सत्संग में बैठना है तो सुबह से जल मत लो। पेशाब नहीं लगेगी। ऐसा नहीं हो सकता तो वहीं से वीडियो देखो। भीड़ बढ़ाकर क्या मतलब। रेस में दौड़ने जा रहे हो और कह रहे हो मैं लँगड़ा हूँ, तो रेस में क्यों गए। गली मोहल्ले में दौड़ते। इस कुटिया को मैंने इसलिए बनाया है कि जिसका जीवन इस ज्ञान में लगा, उसे बनाना था, ताकि जिसे सीधा उससे मिलना हो उसके लिए जगह हो। ऐसे रहना भी पड़ेगा। आगे यहाँ का नियम और सख्त होने वाला है। यह उसके लिए बनाया है जिससे सीधा उससे मिलना हो। उसमें तीसरा कोई नहीं। आप और वह। यह गपसप और शोर के लिए स्थान नहीं बन रहा। हलवा, काजू, बादाम, छुहारा, भंडारा, इसके लिए नहीं बन रहा। यह स्थान मैं पूरे भाव से उस परमात्मा से मिलने के लिए बना रहा हूँ। ऐसे लोग यहाँ रहें जो सच में उससे मिलना चाहते हैं। वाहवाही के लिए नहीं। आने वाले समय में नियम और कठिन होगा। पैर फैलाकर बैठना, सुबह उठकर अंदर घूमना, यह आगे नहीं चलेगा। एक ही रहे, पर सधा हुआ। हम हॉस्पिटल थोड़े खोले हैं। तुम्हें बेड रेस्ट चाहिए तो अपने घर जाओ। हो तो तप करो। बुजुर्ग लेटा हो तो चलो, बुजुर्ग को जरूरत भी है। तुम जवान होकर उसे देखकर कमर टेढ़ी कर रहे हो। साठ क्या है। पूरी रात सत्संग सुना, अब लाइव में गाली देता है कि कुर्सी पर नहीं बैठ सकता। साठ का क्या है। मैंने कहा, तुम बैठोगे नहीं। वह आदमी सत्संग में बैठा एक बार भी नहीं उठा। होता तो उठा देता। कुर्सी देखकर कुर्सी तोड़ने लग गया। कमर में पीड़ा किसके है? मेरे कमर में पीड़ा नहीं है क्या? तीन चार घंटे एक ही आसन में बैठकर सत्संग हो रहा है, हमें पीड़ा नहीं होती क्या? तुम्हारे लिए बैठे हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए। यह काम व्यापार करने के लिए थोड़े कर रहे हैं। तुम मेरी बायीं करो, क्या आश्रम था, क्या जूते कपड़े, हम देखेंगे तुम कैसे हो वैसी व्यवस्था देंगे। यहाँ डोनेशन का काम नहीं हो रहा। तुम्हारे बैकग्राउंड से कोई मतलब नहीं। इसलिए कितने लोग आते हैं और चले जाते हैं। बैकग्राउंड समाज में दिखाना, घर पर दिखाना, मेहमानी में दिखाना। यहाँ नहीं चलेगा। यहाँ सिर्फ तुम चलोगे। सच में साधक हो तो रहो, नहीं तो भागो। हमें अपने आप को जवाब देना पड़ता है कि कहीं तू भी होटल तो नहीं बना लेगा। अस्सी प्रतिशत से ज्यादा आश्रम होटल हैं। गाड़ी से जाओ तो एसी कमरा, पैदल जाओ तो सामान्य कमरा। यहाँ ऐसा नहीं। तुम करोड़पति हो तो भी अपनी प्लेट खुद माँजनी पड़ेगी। यहाँ सेवक वर्ग इस तरह नहीं है। अरबपति हो या करोड़पति, प्रोफाइल अपने पास रखो। भोजन करके प्लेट में आओ। नहीं तो निकल लो। हमें जवाब देना है। इसे होटल नहीं बनाना। होटल बना तो आग लग जाएगी। होटल बने तो इससे अच्छा इसे आग लगा दो। यह होटल नहीं बनाना। पूरे भाव से बनाया है। इसमें मेरा जीवन लग गया है, इस प्रत्यक्ष ज्ञान में। यहाँ परमात्मा से मिलने के लिए जगह है। रहने वाला साधक परमात्मा से मिले। यही पूरा भाव है। बहुत लोग सलाह देने आते हैं, ऐसे नहीं ऐसे करो। मैंने कहा, साधना करो। सलाह देने आए हो क्या। तेरह साल से एक कपड़े में, दुकान से कपड़ा लेकर फाड़ता रहा, पागल की तरह घूमता रहा। अपने आप को योग्य बनाया, तब इस काम की शुरुआत की। अब तुम आकर सलाह दोगे। मैं भी कहता हूँ, साधना करो, नहीं तो निकल लो। तुम्हारी सलाह की यहाँ एक प्रतिशत भी जरूरत नहीं। हम कह देते हैं, तुम सोचो ही मत। जो शब्द आखिरी बोल दिया, वही आखिरी है। अगर कुछ कमी होती तो मैं यह काम करता ही नहीं। जब सौ में सौ एक प्रतिशत पक्का हो जाता है, तब काम की शुरुआत करता हूँ। सौ में सौ किया, एक और घुसा दिया। अब तुम कहाँ से घुसाओगे। घुसाने का स्थान नहीं रहा। अब इसका लाभ लो। एक मैंने घुसा दिया, सीना ठोककर। तुम नहीं घुसा पाओगे, क्योंकि जगह मैंने भर दी। इसलिए यहाँ से बहुत लोग नाराज होकर जाते हैं, और लाइव में गालियाँ देते हैं, वैसा है वैसा है। पहले भगवान थे, गले लगाने के लिए तरसते थे, पाँव मिल जाए तरसते थे। अब कहते हैं इस पाँव पर मेरा अधिकार है, और गालियाँ दे रहे हैं। क्यों? उनके तरीके से नहीं चला। आजकल लोग अपने आप को खोजी कहते हैं, साधक कहते हैं। इन्हें तलुआ चाटने वाला गुरु चाहिए। तलुआ चाटे तब लगता है सच में गुरु है, क्योंकि डोनेशन के लिए तलुआ चाट रहा है, जेब की सफाई के लिए। मैंने लोगों की मानसिकता देखी। एक जन मिलने आए, छत्तीसगढ़ की तरफ से, रायगढ़ से। फोर व्हीलर से आए, एक दिन चले, दूसरे दिन पहुँचे, रात रुकने वाले थे। कुर्सी पर बैठ गए। घुटने में तकलीफ हो, कमर में तकलीफ हो, तो अलग बात। मैंने कहा उतरो, यह कुर्सी तुम्हारे लिए नहीं है। उतर गए। कुछ देर बाद बोले, हम जा रहे हैं, फिर आएँगे। मैंने कहा ठीक है, जाओ। आओ या जाओ। रहोगे तो यहाँ के सिस्टम में रहना पड़ेगा। रोकने वाला नहीं है। रात बारह बजे के बाद भी जाना चाहो तो जाओ। मैं सचेत कर देता हूँ, कुत्ते खतरनाक हैं, नोंचेंगे तो नचवा लेना। बाद में मत कहना बताया नहीं था। अठारह साल के बाद सरकार भी स्वतंत्र कर देती है। तुम्हें इतनी समझ होनी चाहिए कि जाने की स्थिति है या नहीं। मुझे अपने आप को जवाब देना पड़ता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों की बात करता हूँ और खुद वैसा कर रहा हूँ। देखना है, क्या सच में इस ज्ञान के द्वारा उससे मिलना होगा। क्या सच में कुटिया साधक के लिए बनाई है। कहीं इधर उधर तो नहीं हो रहा। मैंने अपने आप को सेवक भी बनाया और मालिक भी बनाया। सेवा भी करता हूँ और अपने आप से पूछता भी हूँ, सच में सेवा हो रही है क्या। कहीं मालिकपन का भाव तो नहीं आ गया। कहीं गाड़ी वाले के लिए अलग सेवा और पैदल वाले के लिए अलग तो नहीं। सबका जवाब देना पड़ता है। सेवा की शुरुआत करना सरल है। परिणाम तक ले जाना सरल नहीं। सेवक ही उससे मिलता है। मालिक कभी मिल नहीं पाता। मालिक भी मैंने अपने आप को बनाया, लोगों के लिए नहीं, अपने आप को जाँचने के लिए। काम को काम के तरीके से करना, जरा सा इधर उधर न करना। पूरी तरह जाँचते रहते हैं। सेवा करना इतना आसान नहीं जितना लोग समझते हैं। सेवा के नाम पर ज्यादा लोग मेवा खाने लगते हैं। देर थोड़ी लगती है। पहाड़ पर चढ़ने में कितना लगता है, उतरते हो फुर्ती से। चढ़ने में कठिन, उतरने में मजा। ऐसी जिंदगी है। आर्थिक और आत्मिक स्तर उठाने में बहुत मेहनत पड़ती है। गिराने में एक झटका लगता है। एक्सीडेंट में घंटे थोड़े लगते हैं। सेकंडों में होता है। नजर हटी, दुर्घटना घटी। ऐसा ही इसमें भी है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। हर समय सावधान रहो। जब एक्सीडेंट होता है तो कुछ सेकंड में। दुनिया में कोई एक्सीडेंट एक घंटे दो घंटे में आराम से होता है क्या? हुआ तो हो गया। ऐसे ही गिरे तो गिर गए, तुरंत। हर वक्त, हर पल, हर क्षण सचेत रहो। तब निकाल पाओगे। एक झटके में व्यक्ति गिरता है। बिल्डिंग बनाने में महीने लगते हैं। बुलडोजर लाओ, एक दिन में सफाया। दोनों मशीनें इंसान ने बनाईं। बनाने वाली चीज में समय लगता है, बिगाड़ने वाली फटाफट। दोनों का निर्माण मानव करता है, पर बिगाड़ने वाला तेजी से और बनाने वाला धीमे। क्यों ऐसा नहीं कि बनाने वाला फट से बने और गिराने में समय लगे? इसलिए आत्मिक स्तर उठाने में सालों लगते हैं, और एक सेकंड में गिर जाते हो। सालों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। अकेले में भी गिरना हो सकता है। जब तक प्रतिक्रिया नहीं, बचने के लिए अकेले रहो तो अकेलापन भी गिरने का स्थान बन जाता है। लोग अकेले में भागते हैं और वहीं गिरते हैं, अगर नशा लेकर गए। दो हजार बीस की बात है। गुजरात में जंगल में एक बाबा रहते थे। नर्मदा तट पर, राजपीपला के आसपास, सुफानेश्वर मंदिर के आगे। उनके साथ गया। कई वर्षों से, बीस साल के ऊपर वहाँ रहते थे। मैंने देखा, बाबा को कुछ नहीं मिला। इतने बीहड़ जंगल में जवाब नहीं मिल रहा। शाम हुई, रात होने लगी। आश्रम पहुँचे तो चिलम चल रही थी। जवाब मिल गया। बाबा इतने साल चिलम के साथ रहे। लोग बोल रहे थे, बाबा तुम्हारी वजह से धर्म बचा है। मैंने कहा, इन्हीं की वजह से धर्म गिर रहा है। चिलम पीने वाले कह रहे हैं गुरु ने धर्म बचाया। मैंने कहा, ऐसे गुरु ने धर्म तबाह कर दिया। समझ नहीं पा रहे। चलो, जवाब मिल गया। हिमालय में तुंगनाथ, केदारनाथ से भी ऊपर। वहाँ सुलफा मार रहे थे। मैंने कहा मुझे जाना है। बोले रुको, यहाँ सीधी बात होती है। मैंने कहा, चरस मारने के बाद सीधी बात होती है क्या? उतरकर नीचे आता है आदमी। वे सुलफा मारकर बैठे थे। केदारनाथ में भिखारी बन गए। बताते हैं लाखों कमा लेते हैं। गेरुआ रंग पहनकर माँगने बैठे। गेरुआ कौन पहनता था, जिसे परमात्मा से मिलना होता था। अब गेरुआ पहनकर घर घर भीख माँग रहे हैं। कितना गिरा दिया। यह त्याग का प्रतीक था। ज्योतिर्लिंग के पास बैठकर भीख माँग रहे हैं। हिमालय में दुर्भाग्य है। देखना भाई, कहीं तुम भी ऐसा न कर लेना। ज्यादातर ऐसा ही होता है। बीड़ी के साथ हैं। एकांत में भी नशा ही सहारा है। एकांत में जाना है तो सच में तुम हो, यह देख लेना। चाहे एक दिन का एकांत हो, चाहे एक घंटे का। मैंने हिमालय में देखा, लोग सुलफा मार रहे हैं। खुले में मारते हैं, गिरोह बनाकर। शर्म की बात है। नए युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं। चिलम पिला पिलाकर। तुम्हारे क्षेत्र में आते हैं, तुम व्यवस्था करते हो, और तुम्हारे युवाओं को बर्बाद करते हैं। गाँजा पिलाकर, चरस पिलाकर, और ऐसे लोगों को गुरु बोलते हो।

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वीडियो: बिना गुरु के नाम जप सफल होगा कि नहीं ? | गुरु के बिना नाम जप ! #livesatsangyogijika · 2025-03-10