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प्रश्नोत्तर P6-0131 · भाग 6

क्या मन कर्म से बनता है, और उसके असर में दिक्कतें होती हैं? आंख, पलक, बीज और मकान की तरह क्या सब पहले से तैयार है? क्या सृष्टि की हर घटना पूर्व निश्चित है? मैं निश्चित करके आया, फिर योजना बदल गई और बेईमानी में फंस गया। यह फिक्स मैं ही कर रहा हूं क्या? फिक्स है तो फिर करना क्या है?

मन तो है ही। अपने आप है, शरीर में अपने आप है। तुम कर्म करो या ना करो, कर्म में सहायक बनता है। शायद जब शरीर बन रहा होगा, साथ-साथ वो भी बन रहा होगा। वो भी सक्रिय है। वो हमारा ही अंग है, लेकिन अदृश्य रूप से। अब जैसे आंख तैयार हो रही है, तो इसके लिए पलक भी तैयार हो रही है, बरौनी भी तैयार हो रही है। सब साथ में, क्योंकि तैयार करने वाला पूरा प्लान कर लिया है कि कब क्या बनाना है। पीछे कोई तैयार कर रहा है, तो उसने प्लानिंग कर ली है कि इसके बाद क्या बनाना है। सब पहले से तैयार है। तैयार होने से पहले ही तैयार है। तभी तो तैयार किया जा रहा है। नहीं तो कुछ का कुछ तैयार हो जाता। तैयार करने वाला पहले से ही तैयार कर देता है। फिर वो प्रत्यक्ष हो रहा है। तो प्रत्यक्ष में विवाद लगता है कि नहीं, यह तैयार अभी हुआ। अभी नहीं, पहले ही हो चुका है। अप्रत्यक्ष रूप से तभी वो प्रत्यक्ष होता है। बीज के अंदर टहनियां थीं। बीज के अंदर ही फल थे। पहले से उसमें है। इसका नाम ही परमात्मा है। सब पहले से तैयार है। तुम्हें लगता है कि अभी यह बन के तैयार हुआ, लेकिन पहले से तैयार हुआ है। तब आपने बनाने वाले को बताया कि कैसे बनाना है। एक है बनाने वाला, एक है बनवाने वाला। बनवाने वाला पहले से तैयार कर लेता है। बनाने वाले को बताता है कि मुझे ऐसा चाहिए। बनाने वाला वैसा बना देता है। अब आप कहते हो कि यह गेट इधर लगाना है, तो इधर लगा देता है। आप बनाते हुए कौन दिख रहा है। बनाया उसने नहीं। निर्माण किसी और का था, प्रत्यक्ष उसने किया। लेकिन प्रत्यक्ष के पहले, अप्रत्यक्ष रूप से, वो बन चुका है। बनाने वाला प्रत्यक्ष करता है, लेकिन बनाने वाले के पहले ही बन चुका है। किसी ने बना दिया है। पहले मानसिक रूप से तैयार है। हर चीज के लिए सब चीज बनी हुई है। बस वो समय, काल, स्थिति और परिस्थिति आती है, तो वो इकट्ठी हो जाती है, और रूप आपको दिखता है। कुछ दिन पहले देखिए, अब यह बना। यह बना, तो कुछ दिन पहले बनाने वाले को पता चला, उसके बाद आपको पता चला। लेकिन आपके पहले भी यह तैयार था। आपको बाद में पता चला। कोई और है, उसको पता था कि यहां यह बनेगा। उसके पीछे भी कोई है। ऐसे ही पूरा चक्र है। आपके सामने दो तो प्रत्यक्ष हैं। एक आप हो, और एक बनाने वाला है। उससे पहले आपको यह नक्शा आ गया था। तभी तो इतना अंतर है। लेकिन आपके पहले भी यहां ऐसा बनेगा, यह अगर देखा जाए तो सौ साल पहले से भी निर्णय था। यह आपको नहीं पता। आपको कुछ दिन पहले पता चला। कई वर्ष पहले से था। दिनों को कितना भी ले लो, क्योंकि यह समय के बाद, समय के पार की बातें हैं। इसलिए सौ साल में भी पता नहीं चलता। क्या यह सब पूर्व निश्चित है। हां, वही तो बात है। अब जैसे जमीन आपने खरीदी, फिर यह नक्शा निकाला, आज हम इस हॉल में बैठे हैं। हमसे पहले आपको पता था कि यह जमीन आप लोगे। जब कुटिया में रहते थे, तब हमें दिखता नहीं था। तब हमें पता था, यह जमींदारों की जमीन है। आपको पता था कि आप यह जमीन लेने ही वाले हो। लेकिन उससे पहले यहां गांव था, यहां खेती होती थी। प्रकृति को पता था, यहां बाढ़ आएगी और यहां आश्रम बनेगा। कब किस चीज का आना है, कब प्रलय होना है, सब निश्चित है, क्योंकि कहीं ना कहीं कोई तो प्लान कर रहा है। एकदम निश्चित सब है। जब हम निश्चित करने लगे, तो फंस गए। हम आए थे निश्चित। लेकिन जब मैं निश्चित में आया था, तो कुछ और था, और जैसे मैं आया, कुछ और हो गया। तो जितना मैंने निश्चित किया था, अब मैं उसे ही बदलना चाह रहा हूं, और उसमें बेईमानी करके मैं फंस गया। बेईमानी का दोष मेरे ऊपर लग गया। मैं निश्चित करके आया। मुझे क्या करना है। हां। आप देखो, यहां भी आप आए, तो वहां से आने से पहले निश्चित किए थे कि मैं यहां क्या करूंगी। अब छोटे बच्चे को हम स्कूल भेजते हैं। बस इतना सा मां-बाप को पता है कि यह पढ़ाई करके संसार में जीना सीख जाएगा। एक अनपढ़ आदमी को देखते हैं, एक पढ़े-लिखे को देखते हैं। इसलिए अनपढ़ मां-बाप भी चाहते हैं कि मेरा बच्चा पढ़ ले। इसलिए वो स्कूल भेज रहे हैं। लेकिन बच्चा डिसाइड करके आया है कि उसको क्या बनना है, संसार में क्या-क्या करना है। वो डिसाइड करके आया है। तभी उसके मां-बाप उसको भेज रहे हैं। सब निमित्त बन रहे हैं। मैंने इसके पहले भी कहा है, सब फिक्स है। पीछे तुम ही हो। पीछे तुम ही हो। अब जैसे मान लीजिए, बनाने वाला यह बोले कि मैंने नहीं बनाया। उसे कोई पूछेगा, तो कहेगा, मैंने बनाया। क्या उसने बनाया। और कह देते, तेरा क्या होगा, तूने क्या बनाया। फिर आपके पास आएगा, तो कहेगा, नहीं, इन्होंने बनवाया। तो क्या आपने बनवाया। मैंने तो बोला ना। हां, तो यही है। आपके मन में था कि आप यह जमीन लोगे। लेकिन आपसे पहले यहां लोगों की भैंसें चरती थीं, फसल होती थी। फिर बाढ़ का आना। उससे पहले क्या। उससे पहले ही निर्णय था कि यहां यह होगा। अब कितने साल पहले यह फिक्स हुआ, यह कोई नहीं बताएगा। और यह कब तक रहेगा। फिर इसका विनाश हो जाएगा। फिर यहां कुछ और बनेगा। क्योंकि होना ही होना है। यह कालचक्र है। एक चक्कर की तरह यह चलता रहता है। आप इसमें से बस निकल जाओ। सीधी सी बात है। फिक्स हो या ना हो, दोनों हाल में आप इसमें से निकल जाओ। हम ज्यादा ड्रामेबाजी में फंस जाते हैं कि मैं यह कर रहा हूं, इसके लिए मैं यह प्लान कर रहा हूं। जिंदगी खत्म हो जाती है। कहेंगे, सब फिक्स है। फिक्स है तो फिर क्या कर रहे हो। फिक्स है या नहीं है, उसे छोड़ के, क्या आप करना चाहते हो, वह कर क्यों नहीं रहे। क्या आपको चाहिए, देख लो। एक बार जो करना चाह रहे हो, फटाफट कर लो। यह नहीं कि उसमें मजा आ रहा है या नहीं आ रहा है। हम थोड़ा समाज की धारणाओं में सोचते हैं। अगर किसी के बारे में सोचना है, तो पहला मैं, और दूसरा यह कि मेरे वजह से किसी को तकलीफ ना हो। फिर इसके बाद और सोचना पड़ेगा। जो होता है, जिम्मेदार वो होगा। इतना मुझे पता है कि मैं नहीं रहूंगा। अपनी जांच करो। अपना लक्ष्य बना लो। मुझे ईमानदार रहना है। मेरे ईमानदार होने से भी अगर उसको तकलीफ है, वो जाने, उसका काम जाने। लेकिन मैं अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ सकता। क्योंकि मुझे निकलना है। मैंने तय कर दिया है कि मुझे बस निकलना है। निकलना, मैं जो मैं और मेरा में घुस गया हूं, वहां से निकलना है। दुनिया और संसार से नहीं निकलना। दुनिया से कहां निकलो। जितने महात्मा हुए, वो भी तो इसी दुनिया में रह के आनंद में रहे, अपने कर्म किए और गए। उन्होंने भी कुछ कार्य किया और गए।

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वीडियो: Sunday Q&A August 2, 2026 #Yogi · 2026-08-02