प्रश्नोत्तर P6-0129 · भाग 6
मन और दिमाग, या ब्रेन, में क्या फर्क है? हमें बताया गया कि ब्रेन से हम शरीर को फील करते हैं और ब्रेन में सिग्नल जाते हैं। क्या मन केवल शरीर की जरूरत बताता है या स्मृति का भी सहायक है? क्या मन नौकर है या सहायक? शरीर के इशारों के साथ साधक को क्या करना चाहिए?
कान खराब हो, तो मन थोड़ी ना, हमारा ब्रेन थोड़ी ना आवाज को समझ पाएगा। अगर हमारा हाथ काम ना करे, तो ब्रेन बताएगा क्या। नहीं बताएगा। मन निमित्त है। ब्रेन और दिमाग तो एक ही बोलते हैं। इंग्लिश में ब्रेन और हिंदी में दिमाग। और मन तो शरीर के लिए काम करता है। शरीर की सारी जरूरतों को देखता है। हमें पीछे खुजली आ रही है, तो मन ही इंगित कर रहा है कि यहां खुजली आ रही है। तो मैं उस जगह पर अपने अंग को ले जाता हूं, उसको हटाने के लिए। मन हमारे शरीर के लिए काम करता है, सिर्फ शरीर के लिए। उसको हटाना आपके ऊपर है। मन सिर्फ शरीर की जरूरतों को इंगित करता है। वो भी कहां तक। जहां तक अंग सही है। अगर सही नहीं है, तो वहां नहीं बता पाएगा।
मान लीजिए मोबाइल ऐरो द्वारा चलता है, लेकिन आपने फाइल में लॉक लगा के लॉक भूल गए। तो अब ऐरो को लेके जाओगे खोलने के लिए, लेकिन वो लॉक मांगेगा। लॉक आप भूल गए हो, तो कितना भी ट्राई करो, कुछ नहीं होगा। लेकिन लॉक कहीं आपको याद है। और कभी-कभी बाद में हमें याद हो जाता है, हम खोल लेते हैं। तो मन क्या करता है। निमित्त है। मन सिर्फ हमारे शरीर की जरूरतों को इंगित करता है। यह हमें समझना बहुत जरूरी है।
जितना भी आपने पहले लेन और देन किया, उसी के द्वारा इनकम होगी, उसी के द्वारा आउटपुट भी होगी। आपको अपनी समझ को विकसित करना पड़ेगा। विकसित करने के लिए जिसकी समझ विकसित हुई है, उसके पास जाना पड़ेगा। वह तरीका बताएगा किस तरीके से विकसित करो। मन आदान-प्रदान है। जब से आपने शरीर धारण किया है, जितना आपने आदान और प्रदान किया है, वो बताता है। और आपका शरीर है, उसके बारे में बताता है कि क्या जरूरत है। यही मन का काम है। यह क्लियर करना बड़ा जरूरी है, क्योंकि हमारी आदत हो गई है। मन को लेकर लोग बड़े भ्रम में पड़ गए हैं। मन को तो एकदम छोड़ ही दो।
सहायक तो है। लेकिन वो अपने आप काम कर रहा है। पीछे मैं तो निमित्त हूं। निमित्त तो आप हो। अब उसको हमें कहीं लगाने की जरूरत नहीं। मुझे क्या चाहिए, वो फैसला लेना है। उसके द्वारा वो मेरा नौकर ही मानो, एक्टिव नौकर है। नौकर एक शब्द अलग होता है। उसे लोग अलग तरीके से लेते हैं। सहायक हम बोल सकते हैं। नौकर नहीं बोल सकते। मुझे नौकर शब्द ज्यादा सूट करता लगता है, लेकिन नौकर नहीं है, इसलिए नौकर नहीं है। अगर आपको भूख नहीं लगी है, तो आप उसे भूख पर ला ही नहीं सकते। अगर नौकर होता, तो ले जाते। वो अपने आप काम करता है। वो मेरे अनुसार भी नहीं करता। आपके अनुसार आप करते हो। वह सहायक बनता है। अपने आप पता चलता है। वह शरीर के लिए ही काम करता है, और आप काम करवाते हो। सहायक मतलब, वो ज्यादातर शरीर के लिए काम करेगा। भूख लगी, बाथरूम आया, प्यास लगी, तो वो मेरा कहना नहीं मानेगा। नौकर होता तो मानता। हर समय वही लगा रहेगा। आप सोचो, मैं भूख को रोक कर कोई और काम करूं। वो हमेशा इंगित करेगा, भूख, भूख, भूख, आपको व्याकुल कर देगा। नौकर होता तो हट जाता।
आप कहीं ना कहीं शरीर के द्वारा अगर काम कर रहे हो, तो शरीर पर निर्भर हो। और शरीर के लिए मन काम करता है, तो शरीर की हर जरूरत को बताता रहता है। नौकर नहीं बोल सकते। सहायक बोल सकते हैं, लेकिन अगर सहायक कोई है, तो शरीर का सहायक आपकी समझ है। आपकी सहायक आपकी समझ है। यह तो शरीर के लिए काम कर रहा है। मेरे लिए सहायक सिर्फ एक ही चीज हो सकती है, समझ। क्या आप समझ ले रहे हो, क्या समझ दे रहे हो, वही सहायक है। और बाकी सब अपने आप काम कर रहे हैं। वो मेरे कंट्रोल में नहीं है। इसीलिए समझ को इतना विकसित करो कि इन सब से छूट जाओ। इनका ऐसा सदुपयोग करो कि आप इससे छूट जाओ। नहीं तो आपका ही शरीर आपका शत्रु बन जाएगा। आपको शरीर से पार उठना है।
जब शरीर ठीक-ठाक हो, तभी ज्यादा काम हो सकता है। नहीं तो यह तो जाने ही वाला है। मशीन ठीक है, गाड़ी की, तभी आप पहाड़ों पर चढ़ा सकते हो। अब अस्सी साल में चढ़ा रहे हो, तो धौं-धौं बोल रहा है। उतनी ताकत शरीर में नहीं है। यह साधन है, उस परम साध्य तक पहुंचने का। इसलिए मेरा कहना है कि जवानी से भजन करो। अपने आप को जवानी में लगाओ। नहीं तो शरीर को ठीक करने में पूरी एनर्जी चली जाएगी। साठ के बाद शरीर को ही ठीक करने में आपका समय चला जाएगा। फिर तो यह भी नहीं समझ पाओगे कि मन अलग है, शरीर अलग है, मैं अलग हूं। इसलिए मन को अच्छी तरह समझ लो। आप क्या करते हो, आपकी समझ कहां विकसित है, आपके क्या करने से क्या होगा, वो आप देख लो। मन को तो छोड़ ही दो। मुझे यह चाहिए, फिर मन उधर लगा दो, लग ही जाएगा। आप जाओगे तो लगना ही पड़ेगा। मेरे पीछे ही तो सब आएंगे।
एक अर्थ में वो कुछ नहीं है, और एक अर्थ में वो मेरा सहायक भी है। अब जैसे मन ने इंगित किया कि आपको भूख लगी है, लेकिन आपने कहा कि कोई बात नहीं, मैं यह जानकारी इकट्ठा कर रहा हूं। तो जानकारी इकट्ठा करने में उसको सहायक बनना पड़ेगा। भले वो इंगित करेगा कि भूख बढ़ रही है, लेकिन एक तरफ जानकारी भी इकट्ठी होती रहेगी। इसीलिए अपने शरीर को उचित पोषण देके, जरूरत में जियो, और अपनी समझ को विकसित करो। आपको देखना पड़ेगा कि मेरे लिए हित क्या है। अगर आप सिर्फ इंगित की ही सुनोगे, तब आप भटक जाओगे। दिन-रात शरीर को संभालने में ही लग जाओगे, क्योंकि वो कहेगा, कहीं भूख लगी है, कहीं पेशाब लगी, कहीं बाथरूम लगा, कहीं मंजन करना है, कभी सोना है, कभी आलस आ रहा है, कभी खुजली आ रही है, कभी मन नहीं लग रहा, कहीं और चलो। आपको देखना है कि आपका हित किसमें है। मुझे क्या करना है। मेरे द्वारा ही होगा।
इंगित कर रहा है, तो करने दो। अगर यह मेरा चल सकता है, तो करने दो। इंगित को रोको भी मत। वो करेगा ही। अगर नहीं करेगा, तब तो गया। अगर नहीं किया, तो वो अंग फेल हुआ। इस स्थिति पर मत ले जाना कि इंगित ना करे। गाड़ी जब रिजर्व में लगती है, वैसी स्थिति मत ले जाना। इंगित ना करे, तब तो वो अंग खत्म हो गया। आपको इतना पता होना चाहिए कि कब मुझे देना भी है। अपने आप को इतना दूर मत लगा दो कि यह मशीन फेल हो जाए। क्योंकि एक बार फेल हुआ, तो गए। बाथरूम आ रहा है, घंटों रोकोगे, तो किडनी फेल हो जाए। ऐसा नहीं कि रोको। और तुरंत आया, तुरंत करो, ऐसा भी नहीं। तुरंत आया और तुरंत करते रहे, तो आप गुलाम हो गए। वो बार-बार कराएगा। आप देखो, मेरी क्या जरूरत है। इंगित तो कर दिया। क्या अभी जरूरत है। आपको इतनी समझ होनी चाहिए कि कब मुझे क्या देना है अपने शरीर को। कितना मुझे खाना चाहिए, कब क्या देना चाहिए, कब इसको नींद की जरूरत है। एक साधक की तरह मैं तय करके उसे समय की सारणी दे दूं। पहले मत हिलाओ मुझे। हम एक शेड्यूल बांध लेते हैं कि अब खाना है, अब नहाना है। तो उसी समय पर यह अलार्म की तरह काम कर देता है।
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