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प्रश्नोत्तर P6-0126 · भाग 6

क्या मन ऐसा है जैसे पिक्चर हॉल में पर्दा दिखाई देता है? क्या मन द्वारा जीवात्मा इस संसार और शरीर को व्यक्त करती है? अंग सुन्न या पैरालाइज होने पर चेतना रहती है या मन वहां नहीं जाता, और शरीर का भान कैसे होता है?

मन निमित्त है। जैसे हम दृश्य देख रहे हैं, तो इसमें हमारी आंखें निमित्त हैं। अगर आंख हटा दी जाए, तो हम देखना चाहेंगे, लेकिन देख नहीं सकते। जैसे कान है, हम सुनना चाह रहे हैं। कान है तो सुन पाएंगे, नहीं तो नहीं। वैसे ही हमारे लिए मन निमित्त है, आदान-प्रदान करने के लिए। वो हमें बताता है जितना हमारे अंदर है, और हम बाहर से पांच इंद्रियों द्वारा संचित करके रखते हैं। तो मन आदान और प्रदान में निमित्त बनता है। जीवात्मा मन द्वारा शरीर को आभास करती है। शरीर का मतलब, मन द्वारा ही पता चलता है कि मेरा शरीर है। जैसे किसी का हाथ काम नहीं करता, तो इतना हाथ है या नहीं है, उसे पता नहीं। उसके टुकड़े भी कर दो, तो उसे पता नहीं। शून्य हो जाता है। आपने देखा होगा, किसी के नीचे शून्य हो गया। अब वो मल-मूत्र कर देता है, उसे पता नहीं चलता। मतलब उसके लिए शरीर है भी और नहीं भी है, क्योंकि वो आंखों से देख पा रहा है इसलिए है, लेकिन मन द्वारा फील नहीं कर पा रहा। जब नीचे शून्य हो गया, तो बाहर की वस्तु में और इसमें मेरे लिए कोई अंतर नहीं। ये है भी और नहीं भी है। मन द्वारा ही हमारा शरीर हमारे लिए प्रत्यक्ष होता है। निमित्त मन ही है। उंगली कट गई, और कट के थोड़ी देर तक अगर मेरे शरीर से अलग भी हो गई, तो जब तक चेतना है, अलग होने पर इधर का फील होगा, उधर का नहीं। चेतना की वजह से फीलिंग आई। मैं आपको बता रहा हूं। यह अंग सुन्न हो गया, लेकिन अंग खराब थोड़ी हो गया। खराब होता तो सड़ जाता। अभी भी इसमें चेतना है। उसको आप खूब दबाइए, उसमें कीला भी घुसा दीजिए, तो उसको पता नहीं चलेगा। चेतना नहीं होती तो सड़ जाता। आपने ऐसे लोगों को देखा है। लेकिन नहीं सड़ता, तो चेतना है। जैसे कई लोगों का हाथ पैरालाइज हो गया, वो सूख-सूख के बिल्कुल काम नहीं कर रहा। लेकिन चेतना तो अभी है। अगर चेतना ही नहीं रहे, तो सड़ जाएगा। लेकिन मन हमें बता नहीं पा रहा। वहां अगर चिकोटी काटो, तो उसे पता नहीं। चाहे उसे अलग भी कर दो, उसे पता नहीं। चेतना नहीं हो तो सड़ जाता। चेतना कम-ज्यादा की बात नहीं है। जैसे पत्थर में चेतना है। चेतना तो है ही। कम-ज्यादा में हमें नहीं जाना है। मन वहां तक जा सकता है जहां हमारा अंग पूरी तरह काम करता है, और मन के द्वारा ही हम भासित करते हैं कि मेरा शरीर है। जब उस अंग में मन काम नहीं कर रहा और चेतना है, इसलिए वो सड़ नहीं रहा। चेतना नहीं होती तो सड़ जाता, उसमें कीड़े पड़ जाते, वो खा जाते। चेतना है, लेकिन मन वहां इसलिए नहीं जा रहा, क्योंकि अंग खराब हो गया है। हमारे अंदर जितनी स्मृतियां हैं, वो हमें हैं। धीरे-धीरे जैसे-जैसे हमारी समझ बढ़ती है, वो हमें याद आने लगती हैं। वो हमारे अंदर ही हैं। कहते हैं, हमें पता है, लेकिन याद नहीं आ रहा, मुंह पर भी नहीं आ रहा। इसका मतलब ये नहीं कि आपके अंदर नहीं है। अभी भी है, लेकिन याद नहीं आ रहा। और एक-आध घंटे बाद, या कुछ ही मिनट बाद, कहते हो, मुझे याद आ गया। तो ऐसे ही जन्म-जन्म से जितनी भी घटनाएं हमारे साथ हुई हैं, वो हमारे अंदर हैं। जब से हमने शरीर धारण किया है, वहां से लेकर अभी तक, पांच इंद्रियों द्वारा जितना लेन-देन किया है, सब हमारे अंदर है। मन निमित्त है, आदान-प्रदान का मैसेंजर है। आदान-प्रदान के पीछे तुम हो। ये चीजें तुम्हारे लिए सहायक हैं। जैसे अंग हैं, वैसे मन भी है। मन अदृश्य है। जैसे हवा हमें छू के जाती है, एहसास होता है, लेकिन देख नहीं सकते, महसूस तो कर पाते हैं। वैसे मन भी है। शरीर के लिए सूक्ष्म रूप से काम करता है।

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वीडियो: Sunday Q&A August 2, 2026 #Yogi · 2026-08-02