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प्रश्नोत्तर P6-0077 · भाग 6

जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता?

जिसका परिवार से कोई मतलब नहीं, जो सब कुछ छोड़कर चला गया, जो आकाशवृत्ति से ग्रहण करता है, कुछ संचित नहीं करता, धन-वैभव से कोई मतलब नहीं, फटे कपड़े पर घूमता रहता है, अपना ध्यान लगाता रहता है, उसको बहुत गाली मिलती है, बहुत मार खाता है। उसका किया हुआ कर्म भी तो राग-द्वेष है। परीक्षा होगी। उसके साथ समाज एक अपराध करता है। कभी ठंड में बिस्तर नहीं, खाना नहीं। उसके लिए यह सब है। जैसे कृष्ण भगवान ने अर्जुन को कर्म का सिद्धांत बताया। क्यों बताया? क्योंकि अर्जुन राजकुमार थे। वे गृहस्थ में रहकर कल्याण चाहते थे, तो उन्हें कर्म का सिद्धांत बताया। वही वाल्मीकि को, रत्नाकर डाकू को, मंत्र दे दिया कि जाओ, तुम्हारा मंत्र। लेकिन उस मंत्र के द्वारा उनके शरीर में दीमक भी लग गए। आपको देखना है कि आप हो कहां, पहले। कृष्ण ने अर्जुन को यह भी बताया था कि आत्मभाव में टिको। क्या टिक पा रहे थे? जब वे समझे कि सब आत्माएं हैं, खुद को आत्मभाव में टिकाया, तब धनुष-बाण उठाया। जब नहीं टिके थे, तब नहीं। जब टिके, तब। जब उनके सारे प्रश्न खत्म हो गए, उत्तर मिल गए, तब टिके। जब सब छूट गया। शुरू में जब वे भाग रहे थे, तो कहा युद्ध करो। उन्होंने कहा, नहीं, सब मेरे दिख रहे हैं, मैं युद्ध नहीं करूंगा। क्या उनकी बात तुरंत मानी? अर्जुन प्रश्न निकालते थे, उत्तर सुनकर चुप हो जाते थे। आत्म तत्व में आखिर में स्थिर हुए। कृष्ण ने तुरंत कहा, हे अर्जुन, भागो मत, युद्ध करो, कोई तुम्हारा नहीं है। अर्जुन ने कहा, नहीं, मैं युद्ध नहीं करूंगा। मेरे लोग मुझे दिख रहे हैं, और मैं धन-वैभव के लिए अपने लोगों को मार नहीं सकता। तो यह आखिरी की बात आप कह रही हैं। आत्म तत्व में वे प्रयास करके थोड़ी स्थिर हुए। प्रयास नहीं किए। आप लोग समझ नहीं पाते। आप गीता का आदेश दे देते हो कि भक्ति मार्ग बताएं, ध्यान मार्ग बताएं। अर्जुन कहीं गए क्या? वही प्रश्न-उत्तर चलता रहा, और उसी में वे आत्म तत्व में स्थिर हुए। क्या वे ध्यान लगाने गए? उन्होंने एक बार भी कहा कि मैं शुद्ध आत्मा हूं? कभी कहा क्या? वे आत्म तत्व में तब स्थिर हुए जब उनके सारे प्रश्न खत्म हो गए। जीवंत गुरु की शरण मिली। जब उनके सारे प्रश्न खत्म हो गए, तब वे आत्म तत्व में स्थिर हुए। स्थिर होने के लिए प्रयास नहीं किए। उन्होंने सिर्फ अपने प्रश्न निकाले। क्योंकि एक भी प्रश्न है, तो आप बाहर हो, बहिर्मुखी हो। उन्होंने अपने सारे प्रश्नों को खत्म किया। वे कहीं ध्यान लगाने नहीं गए। उनकी इच्छा भी नहीं थी कि मैं आत्मज्ञानी हो जाऊं। उनकी तो बस एक ही बात थी। वे कृष्ण भगवान के परम भक्त थे। कृष्ण भगवान की इच्छा थी। जैसे मां काली की इच्छा थी कि रामकृष्ण परमहंस को ज्ञान हो जाए। रामकृष्ण परमहंस की इच्छा नहीं थी। वे तो मां में ही संतुष्ट होते थे, मां में ही खो गए। जब पूरी तरह समर्पित हो गए, तो आदिशक्ति, जगतजननी ने कहा, नहीं, मेरे पुत्र का कल्याण होना चाहिए। तोतापुरी को कहा, जाओ। रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मेरे लिए सब कुछ है, तुमसे कोई मतलब नहीं। तोतापुरी बोले, जा रे, तेरी मां ने ही तुझे बुलाया है। तब जाकर मां से पूछते हैं, तो मां कहती है, हां, जा, उसे गुरु बना, तेरा उद्धार कर देगा। अर्जुन की ज्ञान की कोई इच्छा नहीं थी। लेकिन अर्जुन परम भक्त थे। जब रुक्मिणी ने कृष्ण से कहा, आपका परम भक्त कौन है, तो बोले, अर्जुन। अर्जुन के हृदय से धुन बोलती थी। जब कान लगाओ, तो हरे कृष्ण हरे कृष्ण की धुन आती थी। परम भक्त हो गए। परम भक्त अगर कोई हो जाता है, तो उसका इष्ट उसका कल्याण करता है। किसी के द्वारा करवाएगा, या खुद करेगा। कृष्ण भगवान उस स्थिति में थे, तो उन्होंने खुद किया। और अर्जुन उस लायक हो गए थे, क्योंकि परम भक्त हो गए थे। उनके अंदर लालच थी ही नहीं। उन्हें कुछ चाहिए ही नहीं था। वे भक्ति में लीन थे। इसलिए जब अर्जुन युद्ध छोड़कर जा रहे थे, तो उनके पास ब्रह्मास्त्र था। वे एक बाण में युद्ध खत्म कर सकते थे। इतनी क्षमता उनमें थी। ऐसा नहीं कि कायर होकर जा रहे थे, कमजोर होकर जा रहे थे, डर के जा रहे थे। मोह में जा रहे थे। मेरे लोगों को मैं वैभव के लिए नहीं मारूंगा। नहीं तो एक बाण में युद्ध खत्म कर देते। किसी और के पास वह नहीं था। उनके बाद एक और था, जिसने पेड़ में बाण मारा, हर पत्ते में छेद हो गया। कृष्ण भगवान ने एक पत्ता अपने चरणों में दबाया था। उसके पास तीन बाण थे। अर्जुन एक बाण में खत्म कर सकते थे, वह तीन बाण में। तो उस जगह अगर कोई सर्वश्रेष्ठ योद्धा था, तो अर्जुन थे। उसकी मां ने कहा था, बेटा, तुम उसकी तरफ होना जो हार रहा हो, उसका साथ देना। कृष्ण भगवान ने कहा, यह तो तीन बाण में युद्ध खत्म कर देगा। फिर एक बाण मरवाया, एक पत्ता अपने चरणों में दबाया, तो उस पत्ते में भी छेद हो गया। मेरा यह कहना है कि आप कुछ पढ़िए, पूरी तरह समझिए, उसे निचोड़िए। इसीलिए कहा गया है कि शास्त्रों का अनुसरण किसी योग्य गुरु की शरण में जाकर करो। क्योंकि अगर खुद करते हो, तो भ्रमित हो जाते हो। आप अपनी स्थिति से अर्थ निकालोगे। जैसे एक वृक्ष है। छह-सात साल के बालक से लेकर सौ साल के आदमी तक, सबको बोलो इसके बारे में लिखो, सब अपनी-अपनी स्थिति से अलग-अलग लिखेंगे। लेकिन सामने दृश्य एक ही है। इसीलिए कहा गया है कि किसी योग्य गुरु के सानिध्य में जाकर शास्त्रों का अनुसरण करो। अध्ययन मत करो, अनुसरण करो। और अनुसरण तभी करोगे जब कोई समझाने वाला होगा। अध्ययन करने में व्यक्ति फंस जाता है, क्योंकि वह वही निकालता है जो उसके मतलब का होता है, जिसमें उसे आसानी दिखती है। हर व्यक्ति आसान रास्ता खोजता है। बचपन से आदत है, आसान रास्ता खोजना। जिस काम में मेहनत है, उसमें नहीं जाता। इसमें क्या मेहनत है कि बैठ गए और बोल दिए, मैं आत्म तत्व में केंद्रित हूं? इसमें मेहनत नहीं है। मेहनत तो सत्कर्म में है, ईमानदारी में है, अपने को निचोड़ने में है। लोगों ने अध्यात्म का बहुत अच्छा व्यापार बना लिया है। आप यह मत समझना कि यह बात सिर्फ आपके लिए है, आप कहां हो कहां नहीं। यह तो बहुत लोगों के लिए हो रहा है। बहुत लोग लाइव देख रहे हैं, वे न फंसें। अध्यात्म एक व्यापार हो गया है। अध्यात्म के नाम पर व्यापार हो गया है कि कुछ करना नहीं है। सामने वाले को भी कुछ नहीं करना है। तुम मुझे तार दो। वह कहता है, मैं तुम्हें तार दूंगा, बस तुम कहो कि मैं प्योर सोल हूं, मैं प्योर आत्मा हूं। कहने में भी बड़ा अच्छा लगता है, करना कुछ नहीं है। लेकिन इससे कुछ नहीं होने वाला। इससे बस इतना होने वाला है कि डिप्रेशन का शिकार हो जाएगा। वह किसी से कुछ कह नहीं पाएगा। ऐसे लोग बहुत डिप्रेशन के शिकार हुए। किसी से बातचीत नहीं करते। अपना खाकर पड़े हैं, मंदबुद्धि की तरह। लेकिन जब आप उनसे बात करोगे, तब समझ में आएगा। बहुत चिड़चिड़े, बहुत उदास। मिला नहीं कुछ। कहते ही रह गए, शुद्ध आत्मा, शुद्ध आत्मा। लेकिन शुद्ध आत्मा का कभी दर्शन ही नहीं हुआ। और बहुत लोग ऐसे फंस गए। मैं बहुत लोगों को देखता था, मैं रोता था। आध्यात्मिक व्यापार बना दिया। लोगों को सिर्फ किसी विधि में फंसा दे रहे हैं। आज गुरु शंकराचार्य खुद चिल्लाकर बोले, हजार सालों तक यज्ञ-हवन, विधि करो, तत्वज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी। भज गोविंदम में आपने पढ़ा होगा। कर्मकांड से नहीं होगा। कर्मकांड मतलब विधि। अगर आप कह रहे हो, मैं शुद्ध आत्मा हूं, तो यह भी तो एक विधि है। यह भी एक मानसिक विधि है। आप सिर्फ बाहरी विधि मत पकड़ो। जाप हाथ से भी होता है, मुंह से भी होता है, मानसिक भी होता है। तो यह मानसिक विधि है। भज गोविंदम में उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि लोग अनेक तरह के त्रिपुंड लगाएंगे, अनेक तरह के कपड़े पहनेंगे, मात्र पेट भरने के लिए। फिर उन्होंने कहा, हजार जन्मों तक यज्ञ-हवन करो, ये विधियां करो, तत्वज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी। बिन सत्संग विवेक न होई। विवेक तभी जगेगा जब सत्संग सुनोगे। विधियां सिर्फ भटकाती हैं, चाहे शारीरिक विधियां हों, चाहे मानसिक विधियां। बिन सत्संग विवेक नहीं होता। बिना सत्संग के विवेक नहीं जगता। सत्संग से विवेक जगता है। विवेक जगने से वैराग्य, वैराग्य से तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है। बिना सत्संग का कल्याण नहीं है। इतिहास में जितने भी महापुरुष हुए, उस परम स्थिति में उन्होंने सिर्फ सत्संग किया। शंकराचार्य ने कहीं विधि करवाई क्या? सत्संग ही किए। अष्टावक्र ने राजा जनक को कोई विधि दी क्या? ज्ञान दिया। और अगर घोड़े पर भी चढ़ाया, तो बोले, मन मुझे दे, और तू चढ़। उनसे नहीं करवाया। मन तो ले लिया। बोले, चल, अब घोड़े पर चढ़। फिर बोले, अब रुक जा, मेरा मन नहीं है। उनसे नहीं करवाया। आप देखो, कोई भी संत-महापुरुष कभी विधि नहीं दिया। ये विधियां गुलाम बनाती हैं। विधियां एक नया संप्रदाय खड़ा करती हैं। एक समूह तैयार करती हैं। एक गुलामी की तरफ ले जाती हैं। एक गुलामी से छूटे, फिर नई गुलामी में ले जाती हैं। इसलिए मैंने यहां कोई विधि नहीं रखी। प्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष है। विधियां गुलाम बनाती हैं। एक नया समूह तैयार होता है। एक नया संप्रदाय खड़ा होता है। एक नया पंथ खड़ा होता है। एक नया मजहब खड़ा होता है। और फिर वह समाज के लिए बहुत हानिकारक होता है। जब एक समूह तैयार होता है, तो सामने वाले के लिए बहुत हानि पहुंचाता है। एक झुंड। इसलिए प्रत्यक्ष ज्ञान ऐसा है कि इसको सब अपना सकते हैं। पूरे विश्व में इसका खंडन कोई नहीं कर सकता। क्योंकि इसके बिना तुम्हारा कल्याण ही नहीं होगा।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31