प्रश्नोत्तर P6-0028 · भाग 6
फटे कपड़ों वाली बात क्या थी — आपने क्यों पहने?
फटे कपड़ों में मैं कई सालों तक रहा। जैसे फटा कपड़ा नहीं, जैसे एक कपड़ा पहन लूँ। तो मैं एक कपड़े को दो-दो, तीन-तीन साल पहन लूँ। मेरे पास टाइम ही नहीं था बदलने का। मेरे पास इतना वक्त नहीं था कि मैं जा के नए कपड़े सिलवाऊँ, मैं पहनूँ। क्योंकि श्मशान में रहना है, इस जगह घूमना है। बढ़िया कपड़ा पहनोगे तो कई लोग पूछेंगे। और गंदे फटे कपड़े रहेंगे तो कोई तुम्हें आएगा ही नहीं, धक्का भी मारेगा, तो उसमें अपने राग-द्वेष का भी पता चलता है। आप एकदम वो कपड़ा पहन के जाइए जिसका प्रभाव नहीं हो। तो समाज आपको खुद खुल के दुत्कारेगा। आपसे खुल के लोग बात करेंगे। लेकिन आप एकदम बन-ठन के जाएँगे, तो जैसा आवरण मजबूत रहेगा, उस लहजे में आपसे बात करेंगे।
तो मैंने क्या किया, कि मुझे समाज के लिए काम करना था। अध्यात्म को, प्रत्यक्ष ज्ञान को, हर व्यक्ति तक पहुँचाना था, खोजना था। तो मैंने कहा कि पूरे आवरण से अपने आप को कमजोर कर दो। क्योंकि समाज के लिए काम करोगे तो पहले समाज को समझना पड़ेगा। और जब पूरी तरह सामर्थ्यवान रहोगे, तभी आप समाज के लिए काम करोगे। क्योंकि मैं आपको बताऊँ, शिष्य ही गुरु को खराब करते हैं। जैसे सचिव ने कल बोला, नहीं मत कर, मेरा लो। क्यों नहीं लोगे? जब सबके लिए लिया जा रहा है तो उनके लिए क्यों? एक तरफ आप कह रहे हो कि आप इसलिए अच्छे हो क्योंकि आप सबको एक जैसे रखते हो, और जब आपकी बारी आई तो आप वीआईपी क्यों बता रहे हो? इस बात को गहराई से समझिए।
तो मैंने कहा कि धन से, तन से, और अपनी समझ से, तू जब पूरी तरह मजबूत रहेगा, किसी पर निर्भर नहीं रहेगा, तब तू समाज के लिए काम कर पाएगा। और अगर तू कहीं से भी कमजोर है, चाहे धन से, चाहे तन से, चाहे समझ से, तब तुझे लोग दबा देंगे। तेरे लोग पहले आएँगे, तेरे बनेंगे, और तुझे दबा देंगे, और तुझे अपने जैसा चलाना चाहेंगे। इसलिए हमने तुरंत रगड़ दिया कि ना भाई, अगर कैमरे पे नहीं आओगे तो आप यहाँ नहीं बैठ सकते। सीधी सी बात है। वो आप लोगों के लिए साधारण घटना थी, मेरे लिए नहीं। आप एक तरफ ये चाहते हो कि गुरु ऐसा हो कि सबके लिए एक भाव रखे, फिर उससे जाके कोने में बतियाना चाहते हो। क्यों? तो जब यह सब मैंने देखा, तो मैंने कहा, अपने आप को पहले बलवान बना, सामर्थ्यवान बना पूरी तरह, और तब तू काम कर पाएगा समाज हित के लिए। और अगर तू कहीं से भी कमजोर रहा, तो तेरी कमजोरी का लोग फायदा उठाएँ। किसी पर निर्भर रहोगे तो उसकी बात तो माननी पड़ेगी। वो जहाँ बैठा है, वहीं से चलाएगा। हर आदमी, जहाँ जिसकी स्थिति है, वहीं से चलाएगा।
ऐसा नहीं कि सतीश की कोई प्लानिंग थी। लेकिन सतीश की कहीं न कहीं गलती थी। ऐसा नहीं कि कर्नल जिल की प्लानिंग थी। किसी की प्लानिंग नहीं थी कि वो प्लानिंग करके आए थे। लेकिन ऐसा हुआ। इसलिए मुझे कहना पड़ा कि नहीं भाई, कैमरे पर आना ही पड़ेगा, और कोई रास्ता नहीं है यहाँ। एक रास्ता और है, आप जा सकते हो। और धन की कोई कमी नहीं है। पंद्रह दिए हो, पंद्रह माँगोगे, जगह पे उसी समय दे दूँगा। मेरे जेब में एक नहीं रहता।
ये तो हमें देखती रहती है। हम जब जमीन ले रहे थे, ये सब बोली, आप करोगे कैसे, आज तक ये समझ में नहीं आया। बोला, मेरे पास धन की कमी नहीं है। मेरे पास धन की कमी है ही नहीं। ना मेरे पास ज्ञान की कमी है, ना मेरे पास शरीर के बल की कमी है। मेरे पास अथाह है। मैं अपने आप को पहले अथाह बनाया, फिर मैं काम करने निकला। और मेरा काम मुझसे है। मेरा काम किसी पर निर्भर नहीं है। मेरे काम की व्यवस्था खुद प्रकृति करती है, क्योंकि मैं काम प्रकृति के लिए करता हूँ। मुझे इस काम के बदले कुछ नहीं चाहिए। जब मुझे जरूरत होगी तो आ जाएगा। मेरे पास कोई कमी नहीं है।
और मैंने साधना करके, तपस्या करके, उस लायक अपने आप को पहले बनाया। मैं ऐसे ही नहीं चल दिया कि झोला उठाया और चल दिया, कि बाबा बनना है, लूटना है लोगों को। पहले मैंने अपने आप को बाबा का मतलब समझा, संत का मतलब समझा, साधु का मतलब समझा, सन्यासी का मतलब समझा, बैरागी का मतलब समझा, उदासी का मतलब समझा। जब उस मतलब को समझने के बाद मैंने उस पे काम किया, मेहनत किया, फिर मैं यहाँ बैठा हूँ। यह मैं अपनी मेहनत से बैठा हूँ। ये मुझे कोई फ्री में भगवान, देवी-देवता ने नहीं दे दिया। मैंने अपने इष्ट को भी यूज किया। सीधी सी बात है। अगर हम तुम्हारे पास आए तो यूज करने। तुम हमारे पास आए हो यूज करने। यूज एंड थ्रो, यही दुनिया है। और इसको मैंने स्वीकार किया है। तो हमने कहीं न कहीं अपने इस काम में इष्ट को भी यूज किया। हम इष्ट के लिए थोड़ी न गए। मुझे इस संसार में कुछ काम करना था, और मुझे लगा कि तुम सहयोग करोगे। उस सहयोग के लिए मैं भी काम करूँगा। मैं आपको दूँगा। तो मैं ऐसे यहाँ आके नहीं बैठ गया हूँ कि मैं घर से निकला, पहन लिया गेरुआ, ले लिया चिमटा, और लोगों को चल दिया अलख निरंजन जगाने। पहले अलख निरंजन के लायक मैंने अपने आप को बनाया। मैंने मेहनत किया। अगर आपके सामने हूँ और बोल रहा हूँ, तो यह मेरी मेहनत से है, और मेरा काम मेरे तरीके से होगा, आपके तरीके से नहीं। मेरा काम कैसे होगा, उसका फैसला मैं लूँगा। क्योंकि पूरी प्लानिंग मुझे पता है। काम क्या करना है, मुझे पता है। और मेरे काम से मुझे प्रेम है, बाकी किसी से नहीं।
अगर मेरे काम में आप आए हो तो आपसे भी प्रेम है, लेकिन काम मेरे तरीके से होगा, आपके तरीके से नहीं। आप दो ही चीज कर सकते हो। एक, काम का उपयोग कर सकते हो। और एक, इस काम में सहयोग कर सकते हो। बस, और कुछ नहीं। और आप सोचो कि नहीं, आपके तरीके से होगा। असंभव। क्योंकि आप जहाँ हो, वहीं से करोगे। आप अपने स्तर से ही कुछ बोलोगे। तो आपका स्तर क्या है? राग-द्वेष का। आप थोड़ी न उस स्तर पर पहुँचे हो। अगर आपका फैसला हम मानें, तो आपका फैसला कहाँ ले जाएगा? एक दलदल में ले जाएगा, और जहाँ तुम भी रोओगे, हम भी रोएँगे। दोनों रोएँगे। क्योंकि तुम मेरा लेवल तो गिराओगे।
मैं मुंबई में रहता था, तो मेरा दादर ऑफिस आना-जाना था। मेरे गाँव का एक लड़का मिल गया, नालासोपारा से। बोला, आज मेरे साथ चलो। मेरा फर्स्ट क्लास का पास था, उसका सेकंड क्लास का। तो सेकंड क्लास में गया, वो भीड़। जब हम उतरे तो मैं बोला, दोबारा मत मिलना। एक तो तू मेरे साथ चल नहीं सकता। मैं तो उसमें भी जा सकता हूँ, इसमें भी। लेकिन दोबारा अब स्टेशन पे मत मिलना। आज दुर्दशा करवा दी तूने। वैसे ही अगर मैं आपकी बात मान लूँ, तो आपकी जगह आ जाऊँगा। और आप अपनी जगह तो परेशान ही हो। आपको मेरी बात माननी पड़ेगी, मेरी जगह तक आने के लिए। अगर मैं बात मान लूँ तो आपकी जगह मैं पहुँच गया, तुरंत। और आपकी जगह कहाँ है? तो बस वही आके दोनों रोएँगे। और तुम आए थे वहाँ से निकलने के लिए। तो इसीलिए मैं उनकी बात नहीं मानी।
अगर उसके पीछे कोई कारण हो, लेकिन वो कारण पहले से बताया गया हो, और वो कारण एकदम प्रमाण हो, कि सच में ये कारण है, तो फिर देखा जाएगा। कम से कम उसे ज्ञान तो सीखने आया है, अब क्या करें, मजबूरी है, कोई नौकरी होगी। लेकिन ऐसे नहीं। एक तरीका होता है। जवाब देना पड़ता है।
और मेरा काम मुझसे है, क्योंकि मैंने अपने आप को इस लायक बनाया। मेरा काम किसी पे निर्भर थोड़ी न है। क्योंकि मैं मेहनत से यहाँ तक आया हूँ। मैं किसी कपड़े का सहारा लेकर यहाँ तक नहीं आया हूँ। मैं किसी समूह का सहारा लेकर यहाँ नहीं आया हूँ। मैं किसी सम्प्रदाय का सहारा लेकर यहाँ नहीं बैठा हूँ। मैं अगर यहाँ पे हूँ तो मैं हूँ, और मेरा काम है, और मेरा काम मेरे तरीके से है। मैं अगर इस दुनिया के लिए कुछ लेके आया हूँ, उसमें आप लोग हो, तो वो मेरे तरीके से देना होगा, वो आपके तरीके से नहीं। हम भी कभी आपकी जगह थे। ऐसा नहीं है। मैं उस जगह को समझता हूँ। लेकिन अगर उस जगह की बात मान लूँ, तो दोनों घुट-घुट के मरने लगेंगे, क्योंकि तुम दलदल में हो। मैं दलदल से निकला हूँ। तो तुम अगर मेरी बात मानोगे, तो दलदल से बाहर आ जाओगे। और अगर मैं आपकी बात मानूँ कि आ जाओ, मेरे साथ कूद जाओ, तो दोनों फँस जाएँगे, और दोनों रोने लगेंगे।
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