आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P6-0025 · भाग 6

शब्द और आत्मज्ञान — शब्द कब खत्म?

गुरु जो है वो ज्ञान का प्रतीक है, और शब्द है। शब्द मतलब ये शब्द जो हम बोल रहे हैं, वही बोला जा रहा है। बिल्कुल नहीं। वो अलग तरीके से समझाएगा। शब्द तो टकराव से पैदा हुआ है। शब्द अगर देखा जाए तो शब्द हमें कब चाहिए? जब कुछ चाहिए। जब मुझे कुछ नहीं चाहिए तो क्या आपको लगता है शब्द की जरूरत है? कहा जाता है कि आत्मा को तो कुछ नहीं चाहिए। तो आपको लगता है आत्मा को शब्द की जरूरत है? शब्द चाहिए में काम करता है। और शब्द टकराव में पैदा हुआ है। जैसे ही आप आत्मज्ञान में हो जाते हो, वहां शब्द खत्म हो जाता है। अब शब्द इसलिए बोलना पड़ रहा है। या तो वो जरूरत में बोलेगा, शरीर की जरूरत में, या तो आप आत्मज्ञान तक पहुंच जाएं, उसके लिए। नहीं तो उसे शब्द की कोई जरूरत नहीं। अब उसकी यात्रा अपने आप होगी। उसकी यात्रा अपने आप होगी। जैसे एक मादा गर्भ को धारण कर ले तो मां बनने की यात्रा अपने आप होगी। वहां क्या शब्द की जरूरत है? आपको लग रहा है कि गर्भ धारण के बाद भी कुछ शब्द की जरूरत है तभी वो मां बनेगी। ऐसा है क्या? तो एक जगह ऐसा आता है जब आत्म तत्व में आप स्थिर हो जाते हो तो वहां शब्द का कोई मतलब ही नहीं रहता। शब्द का मतलब लेन देन में है। आपको लेन देन नहीं करना है तो आप चुपचाप बैठे रहते हो। शब्द तो आत्मज्ञान तक पहुंचने के लिए केंद्र में है। केंद्र में जैसे पहुंचे, शब्द खत्म। शब्द दो में है। दो में। आत्म तत्व में स्थिर हो गए, कोई शब्द की आवश्यकता ही नहीं है। आपकी यात्रा ब्रह्म की अपने आप होगी। अब तो आत्म तत्व में जब स्थिर हो जाओगे। खींच के तो जो अंदर की जिज्ञासा है, जो लालच है, वही तो लेके आएगा। कुछ नहीं चाहिए, तो सब एक समान है। और जैसे ही कुछ चाहिए, सब अलग-अलग हो गए, भिन्न-भिन्न हो गए। तो जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तो आत्म तत्व में आप स्थिर हो गए, तो सब एक समान हो जाएंगे। जो अष्टावक्र जी ने कहा, अब ऐसा नहीं कि आत्मज्ञानी गटर का पानी पीने लगेगा। ये मत समझ लेना। आप ये ना समझना कि वो कुछ भी खाने लगेगा, कचरा। आप ये मत समझना कि वो तो सब एक समान है, गोबर खाने लगेगा। ऐसा ना समझना। उसका किसी के प्रति राग द्वेष नहीं रहता। कोई उसके लिए छोटा बड़ा नहीं रहता। कोई अमीर गरीब नहीं रहता। कोई ऊंच नीच नहीं रहता। सब एक समान। कुछ हो तभी तो सोचना पड़ रहा है कि मैं कुछ नहीं हूं। वही तो समस्या अटकी होती है। इसका मतलब कुछ हो। भाई, सोचे बिना तो काम नहीं चल सकता। सोचना भी पड़ेगा, रखना भी पड़ेगा। मैं कुछ हूं, इससे मैं परेशान हूं, इससे मैं कैसे निकल जाऊं। अगर आपको सोचना पड़ रहा है कि मैं कुछ नहीं हूं, इसका मतलब आप कुछ हो। तो कुछ हो से छुड़ाने के लिए आप काम करो, क्योंकि आप कुछ हो से परेशान हो। तो उसके लिए काम करना पड़ेगा, मेहनत करना पड़ेगा। बातों से बात नहीं बनेगी। ईमानदारी, राग द्वेष से छूटना। ईमानदारी, सत्कर्म। ये सर्वप्रथम है। इसके बाद योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग। और जरूरत में जीना। बस इतना आप अपनाओ। बात अच्छा बुरा नहीं। जब आप योग्य ही नहीं हो तो अच्छा कैसे कर पाओगे? उस लायक बनना है। आपको योग्य होने के लिए काम करो। कोई संशय हो तो बोलना। सत्संग को सुनते सुनते सब आ जाते हैं। एक दिन का और समय बचा है। आएंगे। उसका भी लाभ ले लो और अपने संशय को मिटाओ। कैसे भी अपना आत्मिक कल्याण करो। उसके लिए ईमानदारी से मेहनत करो। बातों से बात नहीं बनने वाली है। आपको अपने आचरण में उतारना पड़ेगा। उसमें जीना पड़ेगा। जीने में आप हो। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव से मुक्त होने के लिए आपको काम करना पड़ेगा। आप सोचो, मैं राजा बन गया, तो क्या राजा बन जाओगे? आप शिक्षक बने तो उसके लिए मेहनत की है ना? लेकिन आप सोचते हैं मैं शिक्षक बन गया, तो क्या आप बन जाते? आपने उसके लिए कर्म किया और आज कह पा रहे हो कि मैं शिक्षक हूं। अगर आप कुछ हो तो उसके पीछे आपने काम किया है। ऐसे नहीं हो। तो यहां काम का परिणाम है। और अगर आप फ्री में पाना चाहते हो तो वही आप थके जाओगे। तब रोओगे कि लोगों ने मुझे लूट लिया। तो फ्री में पाने की इच्छा का त्याग करो। अपना आत्मिक कल्याण करो और मेहनत करो।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: दिल्ली में पहला सत्संग पार्ट 2 #योगी · 2026-02-01