प्रश्नोत्तर P6-0015 · भाग 6
गुरु कहते प्रकृति का कर्ज चुकाना पड़ेगा — गुरु का कर्ज क्या?
नहीं। कभी गुरु ने हमें बताया, तुम्हारे ऊपर कर्ज है, तुम्हें मैंने इतना समय दिया, कभी नहीं होता। कभी नहीं होता। इसलिए कि जिस गुरु के पास आप गए हो, आपके जैसे लोग ही उसे सहयोग करके गुरु स्थिति में वो आए हैं। अगर आज मैं आपको यहां ज्ञान दे रहा हूं तो इस ज्ञान तक पहुंचने के लिए मुझे समाज के बहुत लोगों ने सहायता दी है। जगह दी है, भोजन दिया है। अब वह भरपाई हो रही है। यहां कोई कर्ज नहीं है। अगर गुरु कहता है, मेरा कर्ज तुम्हारे ऊपर, तो गुरु है ही नहीं।
हां, तो दे देंगे। प्रकृति का है तो प्रकृति हमसे आके ले लेगी ना, अलग भिन्न-भिन्न रूपों में आके ले लेगी। लेकिन वो कह रहा है, नहीं, मेरा कर्ज है, तब गुरु लायक नहीं। ये शब्द नहीं। तब अगर ये बोला है प्रकृति का, तो फिर वो तो है ही।
तुम आ रहे हो, कहीं ना कहीं ये घुटन तो देती है ना एक सीकर को। भाई, एक तरफ तो गुरु कहता है कि नदी बह रही है, प्रकाश तो रोशनी दे रहा है, सूरज दे रहा है, तुम खिड़की खोलो। दूसरी तरफ आप कह रहे हो, तूने किरण ले ली और तेरे ऊपर बोझ बन गया। तो फिर तो मैं दरवाजे बंद ही रखूंगा।
नहीं, नहीं, आप समझिए, कर्ज क्या है। जैसे मान लीजिए, जितना आपने पीछे अतीत में किया है, उसकी बात वो कह रहा है। ये ज्ञान दे रहा है, उसका कर्ज कुछ नहीं है। उससे कैसे आप निकल जाओ, उसके लिए वो मार्ग बताएगा। पीछे आप जितना किए हो, ज्ञान का कोई कर्ज नहीं। ज्ञान का नहीं। ज्ञान का कोई कर्ज नहीं है। ज्ञान का भी अगर कर्ज होगा तो फिर जो परमात्मा है, निराकार है, जो प्रकृति है, जिसमें तो वो भी सौदा कर रहा है। नहीं, ज्ञान का कर्ज नहीं है। आपके कर्मों का परिणाम है। ज्ञान का कोई कर्ज नहीं।
अब जैसे आप रास्ते में जा रहे हो, या आपसे कोई रास्ता पूछा, तो क्या कर्ज हो गया? ये तो मानवता है। हम लोग कितने से रास्ता पूछते हैं? कितने के यहां पानी पी लेते हैं? उसका नाम भी नहीं पता। कितने से रास्ता पूछते हैं? वो रास्ता बता देता है। क्या उसका कर्ज हो गया? ये मानवता है। हम एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के सहयोग करते हैं। कर्ज नहीं।
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