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प्रश्नोत्तर P6-0009 · भाग 6

अध्यात्म अपनाने में रिस्क क्या है?

अध्यात्म तो यही कह रहा है कि भाई, तू जितनी तेरी बुरी आदतें हैं, छोड़ दे। बस यही है अध्यात्म, और कुछ है? तो रिस्क क्या है? बुरी आदतों को छोड़ना रिस्क है क्या? अपनी गंदी आदतों को छोड़ना रिस्क है क्या? अध्यात्म क्या सिखा रहा है? यही सिखा रहा है कि जितना अपना बुरा बर्ताव आपके द्वारा हो रहा है, वो बंद करो। तो इसमें क्या रिस्क है? संसार किसने छोड़ा? आपको लगता है मैं संसार छोड़ दिया? आपके बीच में मैं नहीं हूं क्या? आपके बीच में नहीं जी रहा हूं? कोई संसार छोड़ ही नहीं सकता। संसार छोड़ के बस मौत है। शरीर छोड़ के निकल जाओ। ये जितने भी महापुरुष हुए, क्या अपने लिए संसार से भोजन मांग के ग्रहण नहीं किए? तो देने वाला कौन था? संसार का ही व्यक्ति था। कहीं ज्यादा आबादी है, कहीं कम आबादी है। संसार किसने छोड़ा? संसार छोड़ने की बात ही नहीं है। आपको लग रहा है कोई व्यक्ति संसार छोड़ देगा क्या? कहां रहेगा? पेट के लिए रोटी तो चाहिए। जाएगा, और जहां भी जाएगा संसार ही तो है। पूरी पृथ्वी को संसार ही बोलते हैं। तो कहां जाएगा? यहां संसार छोड़ने की बात नहीं हो रही है। आपने बुरी आदत धारण की, उसे छोड़ने की बात हो रही है। आप अपने परम आनंद से भटक गए हो। सुख-दुख के गोते खा रहे हो। उसे छोड़ने की बात हो रही है, कि आप अपने आप में कैसे स्थिर हो जाओ। आप कहीं से सुख ढूंढ रहे हो। ये बताया जा रहा है कि आपके अंदर परम सुख है। आप किसी के द्वारा सुख हासिल करना चाहते हो। कहा जा रहा है कि उसको छोड़ो। तुम्हारे अंदर परम सुख है। जब आपने कहा कि मुझे यहां जाना है, तो इनसे पीठ हो गई। इनके लिए तो आप मर गए। वापसी का रास्ता बंद हो गया। रिस्क सिर्फ इतना है कि अपना वापसी का रास्ता बंद करके इनको शरीर दे दो। इनको आपका शरीर चाहिए, इन्हें आप नहीं चाहिए। आप अपने आप को दे दो, इन्हें शरीर दे दो। शरीर के द्वारा कुछ पैदा हो रहा है, इनको वो चाहिए। इन्हें तुम नहीं चाहिए। इनकी हमसे यही अपेक्षा है कि जो तुम वैभव मेंटेन कर रहे हो, वो मिलता रहे। तो इनको शरीर दे दो। संसार को शरीर दे दो, और अपने आप को दे दो। बस बात खत्म। इसमें कोई रिस्क नहीं है। इनको आप चाहिए ही नहीं। आपके शरीर के द्वारा कुछ आ रहा है, वो इनको चाहिए, तो वो दे दो इनको। और अपना अध्यात्म, मानसिक यात्रा करो, अपने आप में रहो। इन्हें आपसे व्यवस्थाएं चाहिए, इन्हें आप नहीं चाहिए। अगर आपको ऐसा लगता है, तो व्यवस्थाएं छीन के देखो और बोलो, मुझे ले लो। कोई नहीं, आपको कोई नहीं पूछेगा। बेटा छोटा वाला यही बोलता है कि अभी छोड़ तो नहीं देना, गुरुजी के साथ अभी छोड़ तो नहीं देना, मैं भी पढ़ लूं। मैंने कहा, मैं भगोड़ा नहीं हूं, तू चिंता मत कर। व्यवस्था पूरी करके ही जाऊंगा। ये सच है, प्रत्यक्ष है। देख चुका हूं। अध्यात्म कोई रिस्क का मार्ग ही नहीं है, क्योंकि अपने आचरण को बदलना है। क्या रिस्क का मार्ग है? कोई रिस्क नहीं है। और जहां मैं हूं, वहां है क्या? वहां भी तो कुछ नहीं है। जब उस लायक हो जाओगे तो आप वो भी हो जाओगे। जैसे आप डॉक्टर भी बने, तो एक दिन में थोड़ी ना बने। पंद्रह सोलह साल की बहुत मेहनत थी। और ये भी पक्का नहीं था कि बन पाओगे। तब रिस्क तो नहीं था क्या? लेकिन फिर बन गए, अपनी योग्यता के अनुसार। बहुत लोग फेल हो गए। तो इस मार्ग में भी बहुत लोग फेल हो जाते हैं। नाम, शहरत, पैसे में फंस जाते हैं। बहुत लोग अपने आप को निकाल पाते हैं। क्योंकि जैसे इस मार्ग में चले, आपको लोग सम्मान देने लगेंगे। जैसे आपने वस्त्र धारण किए, आपको प्रणाम करने लगेंगे। तो इस मार्ग में पतन भी हो जाता है, और मार्ग में निकल भी जाते हैं लोग। जिसके अंदर मान की इच्छा नहीं है, वही निकल पाता है। मुझे मान नहीं चाहिए, ये अगर पक्का कर लिया, वही निकल पाता है। क्योंकि हर जगह बात आती है मान पे। बहुत पास आके भी मैंने देखा, लोग गुरु से रूठ जाते हैं। कोई क्या करेगा? आप डॉक्टर हैं, आपसे पेशेंट रूठ के क्या उखाड़ लेगा आपका? वो अपना बिगाड़ेगा। आपका नहीं कुछ कर सकता। कोई पेशेंट अगर आपसे रूठ जाए, तो क्या आपकी डॉक्टरी की डिग्री चली गई? जब कोई जगह खाली थोड़ी ना है प्रकृति में। अब तुम्हें अपने आप को संवारने का मौका मिल गया। अगर तुम संवारोगे, नहीं तो कोई और आ जाएगा। यहां लाइन लगी है। यहां हर जगह लाइन लगी है। कोई गिर गया, आप नहीं उठाओ, कोई और उठा देगा। हो सकता है आप फिर जाओ तो नहीं मिलेगा। कोई कहे आप भोजन कराओ, आपने नहीं कराया, कोई और खिला देगा। आप यह मत सोचो। आपको प्रकृति ने मौका दिया, क्योंकि आप भी कहीं लाइन में थे। जैसे टिकट काउंटर पे खड़े हो गए। अब आपके पास पैसा नहीं है। लेकिन जैसे ही आपका नंबर आया, वो बोलेगा कहां जाना है? कौन सा टिकट चाहिए? पैसे दो। तुम कहोगे पैसे नहीं हैं, तो बोलेगा अब हट जाओ। तुम कहीं ना कहीं सोचे थे कि मुझे सेवा का अवसर मिले, परोपकार करने का अवसर मिले। तुम्हें प्रकृति ने दिया, तो तुम नहीं कर पाए, तो कोई और कर दिया। हमें कोई भी काम मिला है, तो अपने आप को संवारने का मौका मिला है। अब आप अपने आप को संवारते हो या बिगाड़ते हो, आपके ऊपर है। लेकिन आप यह मत सोचो कि मैं नहीं करूंगा तो नहीं होगा। आपकी तरह कितने आए और गए। आपको तो इस कर्म के द्वारा निकलने का मौका मिला था, कि आप इस कर्म के द्वारा अपने आप को संवार लो, निकल जाओ। प्रकृति ने एक मौका दिया था, क्योंकि यह मौका आपने मांगा था। जैसे आप डॉक्टर हैं। आपको डॉक्टर की डिग्री दी गई, तो वह डिग्री आप ही की मांग थी। अब उस डिग्री का कैसे उपयोग करते हो, वो आपको पता है। तो यहां सब लाइन में खड़े हैं। एक से बढ़कर एक है, तुमसे अच्छा। तुम ना होते तो हो सकता है और अच्छा होता। यह संसार किसी के बिना रुकता नहीं है। आप इस भ्रम में मत रहिए। आपको मौका मिला है। आप अपने आप को निकालो। आप अपने आप को संवार लो। आप अपने आप को सुधार लो। एक मौका मिला है, और एक दिन ये मौका जाने वाला है। तो आपको देखना है कि आपको क्या करना है। यह हमें खुद तय करना है। और रिस्क कुछ नहीं है। अपने पास है क्या? कुछ नहीं। कोई अगली सांस का पता नहीं। तो फिर क्या रिस्क है? लोग कहते हैं हमने त्याग कर दिया। क्या त्याग कर दिए? बेईमानी के अलावा बस, आपने इस दुनिया में आके एक ही चीज धारण की है, बेईमानी। इसके अलावा क्या त्याग कर दोगे? अगर मैं यहां कहूं कि मैंने त्याग कर दिया, तो क्या त्याग किया? घर की जगह आश्रम में रहोगे, ईंट पत्थर वही लगा रहेगा। कपड़े का रंग बदल दोगे। खाने का तरीका बदल लोगे। घर में नमक बोलोगे, नमक दे दो, आश्रम में राम रस बोलोगे। पीछे तो वही है। कुछ त्यागा ही नहीं जा सकता। त्यागने के लिए बेईमानी के अलावा तुम्हारे पास कुछ नहीं है। यहां कोई रिस्क नहीं है। तुम्हारे पास है क्या? जो तरीका अभी तक कंडीशनिंग होकर रखा है, जो मुझे परेशान करके रखा है, वो मुझे त्यागना है। बात खत्म। मुझे भी परेशान किया है। अनेक लोगों को परेशान किया है। वो तरीका, वो व्यवहार मुझे त्यागना है। यहां त्यागने के लिए कुछ है ही नहीं। आपने धारण की है एक ही चीज, बेईमानी। बेईमानी से आगे बढ़ने की इच्छा नहीं। आगे बढ़ने की इच्छा। बेईमानी तो आगे बढ़ने में आपने की है। आपकी गलती है। आपको आगे बढ़ना सिखाया गया था। बेईमानी के अलावा हमने कुछ नहीं धारण किया है। आप कहीं भी चले जाओ। हिमालय भी चले जाओ। क्या छोड़ोगे? छोड़ने के लिए तो कुछ है ही नहीं। बेईमानी के अलावा, चापलूसी के अलावा, और क्या है? यही सब चीजें तुमने धारण की हैं।

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