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प्रश्नोत्तर P5-0053 · भाग 5

(मोहन) समाधि अवस्था में क्या अनुभव होता है? कई महीने?

अभी तो कुछ देर पहले बताया, कुछ नहीं। अनुभव से मुक्त हो जाता है। अनुभव करते-करते जब अनुभव करने के लिए कुछ नहीं रहता, अनुभवकर्ता बसता है। फिर वहाँ कर्ता का भाव भी नहीं रहता, क्योंकि करने के लिए कुछ नहीं रहता। तब वो समाधि की स्थिति। और वो कई महीने तक चल सकती है। कुछ बोल नहीं सकते। आप बोलते रहोगे, बातचीत करते रहोगे। हाँ, कई महीनों तक चलता रहता है। समाधि को चलते, उठते, जागते, बैठते, सोते, नहाते, धोते। सौ में चले गए। पूरे दिन, उस समय, ये भी नहीं बोल सकते। वो ना बाहर है, ना अंदर है। कुछ महीनों। मतलब मैं बोल सकता हूँ कुछ महीनों तक, चार-पाँच से नीचे, कुछ महीनों तक। चौबीस घंटे सौ में हो, ऐसा नहीं, क्योंकि वो आता है, जाता है। उसमें स्व भी नहीं बोल सकते। कुछ बोल नहीं सकते। उसमें ना कोई आधार, ना कोई भेष। कुछ नहीं बोल सकते। ये भी नहीं बोल सकते। ऊर्जा तो कह सकते हैं, ऐसा नहीं। मैं तो ये भी नहीं कहूँ। अपने को इसका होना नहीं। नहीं, ये भी नहीं। आत्मज्ञान के साथ यही दिक्कत है, बता नहीं सकता। जैसा है वैसा बता रहा हूँ ना आपको। एकदम जैसा है, एकदम वैसा बता रहा हूँ। तुलना नहीं की जा सकती। हमारे में ऐसा कुछ भी नहीं है कि मैं उससे इसकी तुलना करूँ। एक अस्तित्व नहीं। बेस, बैकग्राउंड, कुछ नहीं। सब खत्म। आधार, बेस, सब खत्म हो जाता है। बैकग्राउंड वो भी नहीं। जिसको कहते हैं कि पानी उड़ गया, आकार छोड़ गया। वहाँ कुछ नहीं बोल सकते। बता तो रहा हूँ। कोई हमें उदाहरण भी नहीं दे सकता। ना तो किसी से तुलना कर सकता हूँ। कुछ बोल नहीं सकता। क्योंकि आप पूछ रहे हैं तो मैं वहाँ देख के बोल रहा हूँ। ये तो नहीं था। हाँ वही, ये तो नहीं था। कितनी भी कल्पना कर लें, कितने भी शब्द निकाल लें, जैसा है वैसा बता दे रहा हूँ आपको। बार-बार होती रही, ऐसा नहीं। कंटीन्यू। बार-बार बंद और चालू, ऐसा नहीं। वो चल ही रहा था, जब तक वो खत्म ना हो जाए। उसमें आँसू भी गिरते थे। चिल्लाता भी था। कुछ भी होता था, पता नहीं। उसमें सुख-दुख भी नहीं था। कोई पीड़ा भी नहीं थी। कोई घुटन भी नहीं थी। कोई बेचैनी भी नहीं थी। कोई अशांति भी नहीं थी। कोई शांति भी नहीं। कोई प्रसन्नता भी नहीं थी। बाहर के लोग दिख रहे थे, क्योंकि उनसे कुछ चाहिए नहीं था। वे ऐसे नहीं दिख रहे थे कि आत्मा है। नहीं, ऐसा नहीं। सब दिख रहे थे। और खाना, किसी से मतलब नहीं था। सब था। खाना-पीना, बैठना, बातचीत भी करना था। लोगों से बातचीत भी करना था। ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं कि विश्वरूप दिखा दिया। नहीं, सब बातचीत, सब होता था। सिर्फ यह आंतरिक स्टेट थी, जो खुद को ही पता थी। लोग मुझे चिल्लाने भी लगे थे। अवधूत-अवधूत नाम दे दिए। सोया रहता था, ये तो अवधूत है। मतलब वो खुद बोलने लगे। लोगों ने मुझे खुद बोलने लगे। मेरे चाल-चलन, उठने-बैठने को देख के वो बात करते थे। ज्यादा, ये तो अवधूत है। हाँ, ये समाधि की स्थिति थी। प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। पतंजलि सूत्र में जैसे बताया, मुझे नहीं पता। ऐसे-ऐसे कुछ बताया। मुझे नहीं पता। जब कुछ है ही नहीं, तो कहाँ प्रेम बढ़ जाएगा? प्रेम होने के लिए कुछ होगा, तब ना प्रेम होगा। कुछ नहीं। कोई प्रेम, कुछ नहीं। कुछ नहीं रहता भाई। कुछ नहीं रहता। मेरे समझ से वो कर्म नहीं रहता उसमें। कर्म तो छूट जाता है। कुछ नहीं। क्या बोलें। कुछ नहीं बोल सकते। मैं अगर शब्दों में बोलूँ तो कुछ नहीं बोल सकता। कुछ स्थिति हो तो बोलूँ भी। कोई आधार हो, बेस हो तो बोलूँ भी। भैया, ये था ही नहीं तो बोलूँ कैसे। वहाँ मैं भी नहीं था। क्योंकि मैं हो जाता तो ज्ञान ही हो जाता। वहाँ मैं भी नहीं था। ना बाहर था, ना अंदर था। वो भयानक स्थिति भी है, और अद्भुत स्थिति भी है। इस स्थिति के बाद कुछ दिन बाद प्रश्न हट गए। उत्तर हो गए। क्या आया, क्या गया, पता नहीं। खत्म तो पहले ही हो गया था। समाधि के पहले ही खत्म हुआ। उस खत्म होते हुए मैंने देखा। उसे मैं रोकने का प्रयास नहीं किया। खत्म तो तभी हुआ जब नर्मदा तट पे वो महाराज मुझे मिले थे। उसी समय खत्म हो गया था। सब मेरा, सब खत्म हो गया था। पूरी तरह खत्म हो गया था। आँखों में आँसू थे, और मुझे पृथ्वी पर कहीं जाने के लिए रास्ता नहीं था। खत्म तो उसी समय हो गया था। उसके बाद समाधि की स्थिति आई। मेरे समझ से 2019 में दिवाली के पहले की बात है। और दिवाली से एक, दो, तीन, कई महीने मतलब लग गए। कई महीने। लेकिन भयानक भी था। आज मुझे अद्भुत लगता है। लेकिन उस समय कुछ अलग ही था। लोग बोलते भी थे। मैं ऐसे रास्ते से जाऊँ तो बोले, अवधूत जा रहा है। बातें करता था। कभी-कभी बातें नहीं। लेकिन जब तक मैं नहीं बोलूँ, मेरे पास कोई आता नहीं था। जानवर तक भी नहीं आते थे। पता नहीं, मुझे देख-देख जानवर भी भागने लगे। क्या मेरे आँखों में हो गया था? क्या चेहरे पर हो गया था? कैसे मैं खड़ा हो जाऊँ, तो उस रास्ते से लोग आते नहीं थे। डरते थे। अगर मैं ना बोलूँ तो जानवर तक दौड़-दौड़ के भागने लगते थे। पता नहीं क्यों। मैं रास्ते से जाऊँ ना, जानवर आए तो कोई उधर भागे। पता नहीं क्यों कोई उधर भागे। और मैं देखता रहता था, यार ये क्यों भाग रहे हैं। और बड़े तेजी से भागते थे। बहुत तेजी से भागते थे। वो भी डर जाते थे। पता नहीं क्या था। उसके वीडियो नहीं बने थे। ज्ञान के बाद भी वीडियो नहीं बने। मतलब शायद साल के बाद ही वीडियो बने। कहाँ वीडियो बनाना। मिल गया तो ऐसे रात-रात भर बोलता था। शाम से चालू करूँ, सुबह हो जाए। जो मिलता था, उसे पकड़ लेते थे। आ जा भैया, सब पकड़ा जाते थे। घड़ी देखते, सुबह हो गई। उन्हें पता ही नहीं चलता था। और मैं बोलता रहता था। बोलता रहता था। यही तो सही है। शाम से सुबह हो जाए और सब ऐसे बैठ के सुनते रहते थे। ज्ञान के बाद का, तुरंत बाद का, कुछ समय बाद का। सुनते रहते थे। बोल सकता हूँ कि सोलह, अठारह, बीस घंटे ऐसे लगातार, पागल की तरह बोलना। थकता भी नहीं था। शरीर भी नहीं थकता था। जब सोता था, जब उठा तभी चालू। ऐसे तो अभी भी मैं सोलह-सोलह घंटे बोल देता हूँ। आप लोगों के बाद सोता हूँ, पहले उठ जाता हूँ। सपने आते हैं। आते हैं तो आते हैं। अभी क्यों सपने आते हैं, हम क्या जाने। मैंने तो ऐसा कभी प्रश्न नहीं किया। आते हैं सपने, आते हैं। मुझसे क्या मतलब? क्या मैं सपनों को रोकने में लग जाऊँ? हाँ, ये तो है। पूरी नींद पूरी आती है। वो तो है ही। सपने आते हैं। फिर कह रहा हूँ, वो तो है। मैं चाहूँ तो सोऊँ और एक घंटे में उठ जाऊँ। नींद का ऐसा कुछ नहीं। मैं सुबह तक ऐसे ही।

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वीडियो: कैसे पता चलेगा कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है ? / योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-18