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प्रश्नोत्तर P5-0040 · भाग 5

(लाइव/कुटिया) आत्मज्ञान के बाद प्रश्न हट गए — फिर भी कुछ पूछना रहता है? इस जन्म में हर कोई प्रयास कर सकता है?

ऐसा कुछ नहीं। ऐसा कुछ अनुभूति नहीं। मेरे तो प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए। बात खत्म। ऐसे प्रश्न आने ही बंद हो गए। सारे प्रश्नों के उत्तर मिल गए। प्रश्न हट गए, उत्तर ही रह गए। कोई प्रश्न ही नहीं है। अगर मैं पैदा भी करूँ तो नहीं है। मैं प्रयास भी करूँ तो मैं नहीं पूछ सकता। पहले प्रश्न आते थे। प्रश्न तो 2011 से लेकर आखिरी 2019 तक। पागल था। रो रहा था, प्रश्न के उत्तर पाने के लिए। मेरे प्रश्न कभी टूटे नहीं। मैं तो रोते हुए प्रश्न करता था, चिल्ला-चिल्ला के। ऐसा सत्संग कभी नहीं मिल पा रहा था। मुझे ये नहीं हुआ कि प्रश्न करना ही बेकार है, स्वीकार कर लो। मैं पूछ-पूछ के थक गया। अब मैं कहाँ जाऊँ, मुझे नहीं पता। अब मेरे पास सामर्थ्य खत्म हो गई। मैं जितना खोजना था, खोज लिया। अब कहीं जाने के लिए बचा नहीं। ये मेरी आखिरी स्थिति है। आँखों में आँसू, और खड़ा हो गया। अब कहाँ जाऊँ, मुझे पता नहीं। क्योंकि जितनी मेरी सामर्थ्य थी, मैंने पूरी तरह खोज ली। मेरे पास रास्ता नहीं है। ऊपर से लेकर नीचे तक, भिखारी तक को भी नहीं छोड़ा। अब कहाँ छोड़ूँ। थक गया था। कहाँ जाऊँ, समझ में नहीं आ रहा। खोज ही खत्म हो गई थी। जितनी सामर्थ्य थी, धन से, तन से, ज्ञान से, सब लगा दिया था। आखिरी में मैं बचा था। कुछ नहीं मेरे पास बचा था। परिवार से लेकर नाते-रिश्तेदार, सब खत्म हो गया था। मेरे पास कुछ भी नहीं था। एक दिन, कहाँ खोजूँ। थक गया था, क्योंकि सामर्थ्य खत्म हो गई थी। जितना कर सकता था, कर लिया। जनवरी का महीना है। आँखों में आँसू थे। ये मेरी आखिरी स्थिति थी। एक ही प्रश्न था, आत्मज्ञान कैसे हो। बस इसको कोई तोड़ ही नहीं पाता था। जैसे ही जवाब दे, प्रश्न खड़ा का खड़ा। टूटता ही नहीं था। वो कहे, समर्पण करो, तो समर्पण कैसे हो। भक्ति करो, तो भक्ति कैसे हो। ध्यान करो, तो ध्यान कैसे हो। बताओ कैसे हो। ये कभी टूटा नहीं। मुझे पता था, अगर ये प्रश्न टूट गया तो मुझे ज्ञान हो जाएगा। कुछ नहीं चाहिए का भाव मेरा प्रबल था, इसलिए कभी भी हो सकता था। प्रश्न टूटा, तो मुझे पता था, ये प्रश्न टूटा तो आत्मज्ञान होगा। पक्का। प्रश्न टूटते ही तरीका समझ में आ जाता है। ज्ञान का तो बस खत्म हो जाता है। और कर्मों के सेटलमेंट के बीच में ही हो सकता है। कभी भी। अगर किसी की उम्र ज्यादा है, मान लो साठ साल की उम्र में आत्मज्ञान हुआ, लेकिन कर्मों का सेटलमेंट बाकी है, बीच में ही हुआ, तो बचा होगा तो आ जाएगा। अष्टावक्र की तरह। घर में ही ज्ञान था। आठ जगह से कुबड़े पैदा हुए। वो भोग बाकी रह गया था, आ गए। ज्ञान का प्रयास उन्हें करना नहीं पड़ा। लेकिन आठ जगह से कुबड़े थे, वो भोग उनका बाकी था, आ गए। जब मृत्यु की व्यर्थता समझ में आ जाती है, तो जन्म-मरण का कोई मुद्दा नहीं रहता। आने-जाने के लिए, आ जाए तो आए, ना आए तो ना आए। ये तभी आएगी, जब इच्छा और अपेक्षा से आप मुक्त होंगे। उसके पहले तो आएगी ही नहीं। इस जन्म में हर कोई प्रयास कर सकता है, आत्मज्ञान पाने का। इसीलिए तो चिल्ला रहे हैं। किसी भी उम्र में। उम्र का कोई मतलब नहीं है। शरीर की उम्र आपकी थोड़ी है। भोजन कर रहे हो, जा रहे हो। करना है तो कर लो। शादी में जा रहे हो, फिर कर लो। रुकना है तो रुक जाओ। मूल सिद्धांत सबको पता है, ईमानदारी करना। अगर कोई साधक एकांत में जाता है, तो उसके लिए भी सत्कर्म मायने रखता है। वहाँ भी मिल जाएगा। हम लोग आए हैं, तो यहाँ भी मिल जाएगा। अभी एक दिन की बात है। सत्संग वहाँ हो रहा था। माताजी आ नहीं पा रही थीं। दो लोगों ने उठा के लाया, तो उन्हें मिल गया। प्रकृति हर जगह मौका देती है। अपने आप देती है। कोई भी व्यक्ति जिस स्थिति में भी रहता है, जहाँ भी रहता है, उसके लिए ईमानदारी सबसे जरूरी है। हर जगह मिलता रहता है। चाहे कहीं भी रहो, दुनिया में मिल ही जाता है।

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वीडियो: कैसे पता चलेगा कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है ? / योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-18