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प्रश्नोत्तर P5-0037 · भाग 5

क्या आपको कोई आत्मज्ञानी मिला? तीन अद्भुत लोगों की घटना क्या है?

मैं कुछ बोल नहीं सकता। मेरे समझ से अगर आपके पास भोजन होगा, और आप लोगों की भूख मिटा सकते हो, तो मुझे नहीं लगता कि आप अप्रकट रहोगे। आप प्रकट हो जाओगे। मुझे कोई आत्मज्ञानी नहीं मिला। मेरे जीवन में तो नहीं मिला। तीन लोग अद्भुत मिले हैं। एक चित्रकूट में, एक बद्रीनाथ में, एक नर्मदा तट पर। चित्रकूट में मिले, तो मुझे पागल बाबा मिले। पागल नाम था, पागल बाबा नहीं थे। फिर वो बोले कि यहाँ एक अवधूत रहते हैं। गटर के बगल में बैठते थे। बोले, चलो, आपको उनसे मिलाता हूँ। लेकिन वो किसी से बात नहीं करते। मैंने कहा, क्यों नहीं करते, मेरे से करेंगे। अब मैंने ऐसा क्यों बोला। क्योंकि मुझे पता है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे से बात कैसे नहीं करेंगे। अगर मुझे कुछ चाहिए होता, तो मुझसे बात नहीं करते। और जब मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि मुझसे बात ना करें। चलो, चलते हैं। गटर के बगल में बैठे थे। जाके मैं खड़ा हो गया। उनको देखने लगा। वो मुझे देखने लगे। कुछ देर बाद उन्होंने इशारा किया, तो मैंने कहा, आसन दो, ऐसे नहीं बैठेंगे। तो उन्होंने अपनी झोली रखी थी, उसमें से आसन लगा दिया। बैठ गए। हम लोगों ने घंटों बात की। वहाँ भीड़ भी होने लगी। बस उनकी बातों में इतना समझ में आया कि जल्दबाजी मत करो। फिर लोगों ने कहा, आज पहली बार इनको मैं यहाँ बोलते हुए सुन रहा हूँ। आज तक मैंने इन्हें कभी सुना नहीं था। फिर मिलना हुआ, चला गया। इसके बाद उन्होंने कहा, जाओ, वहाँ नदी है, रात भर वहाँ बैठ जाना। मैं गया, रात भर बैठ गया। हुआ कुछ नहीं। लेकिन मैंने उनकी बात मान ली। जल्दबाजी मैंने नहीं छोड़ी। फिर चित्रकूट से बाहर गया। फिर चित्रकूट आते समय रोड पर जाते मिले। मैंने तुरंत गाड़ी रोकी, उनके पास गया। लेकिन दोबारा मुझसे बात नहीं किए। उन्होंने एक ही बात कही थी, जल्दबाजी मत करना। और वो कोई साधारण नहीं थे। ये दूसरे मिले। सबसे पहले मुझे बद्रीनाथ वाले मिले थे। बद्रीनाथ की घटना ये है। जब मैं पहुँचा, तो मेरे पाँव पूरे सड़ गए थे। खून निकल रहा था। मैं गाड़ी वाले से बोला, मैं आगे बैठूँगा। केदारनाथ, तुंगनाथ से बद्रीनाथ जा रहा था। गाड़ी वाले ने कहा, ज्यादा पैसा लगेगा। मैंने कहा, जितने पैसे हों, दे देंगे। ये केदारनाथ में जब बाढ़ आई थी, उसके अगले साल की बात है। गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी वाले से बात होने लगी। जब उतरने लगा, तो बोला, आपसे पैसे ही नहीं लूँगा। मैंने कहा, कैसे, पैसे नहीं लोगे, ये कोई बात होती है। जबरदस्ती मैंने उसकी गाड़ी में पैसे छोड़ दिए। मेरा हिसाब-किताब रहता है। भैया, ले लो। आगे गया। पूछा, बद्रीनाथ का मंदिर कहाँ है। बोले, आगे जाओ। पाँव से चला नहीं जा रहा था, खून निकल रहा था। फिर किसी से पूछा, फिर आगे जाओ। मैंने कहा, बद्रीनाथ को कितना घुमाओगे। आगे एक महाराज मिल गए। कहा, महाराज, बद्रीनाथ का गेट कहाँ है। बोले, आओ चलो, मैं बताता हूँ। ले गए, और गर्म पानी में पहले खड़ा कर दिया। बोले, पहले यहाँ खड़े हो जाओ। गरम-गरम पानी। मेरा चप्पल उठा के रखने लगे। मैं बोला, देखो, चप्पल मेरा मत छूना, महाराज जी। ये मुझे अच्छा नहीं लगता। वो मुझसे उम्र में बड़े थे। आज भी अगर मैं बस में जाता हूँ, और कोई बुजुर्ग आ जाए, महिला गोद में बच्चा लिए आए, मैं खड़ा हो जाता हूँ, सीट दे देता हूँ। ये बचपन का है, आज भी है। खड़े होने की ताकत मुझमें है। बुजुर्ग हो, गोद में बालक हो, या कोई गर्भवती हो, तब मैं सीट पर नहीं बैठ पाता। चाहे वो मेरी सीट क्यों ना हो। सीट देना ही देना है। जबरदस्ती, आपको बैठना है, बैठिए। औपचारिकता नहीं। पाँव-मुँह धोया, बाहर आए। बोले, चलो, तुम्हें बद्रीनाथ का दर्शन कराते हैं। फूल-माला लिए। एक मंदिर में घुसा दिया। मैंने सोचा, यही बद्रीनाथ का मंदिर है। अंदर पंडित बोले, वहीं से करो। मैं वहीं खड़ा हो गया। वो बाहर से चिल्लाए, ओ, बड़ा सा बनता है क्या तू, जाओ। मैं कुछ नहीं बोला। पास में गया, दर्शन किया। फिर बोले, अब चलो बद्रीनाथ का दर्शन। मैंने सोचा, घुमा-फिरा के यही मंदिर है। लेकिन वो बद्रीनाथ का नहीं था, कोई और मंदिर था। ले गए। बोले, अंदर से करोगे कि बाहर से। मैंने कहा, महाराज जी, इतने दूर से आए हैं, अंदर से करेंगे, बाहर से क्यों। बोले, पैसे लगेंगे। मैंने कहा, पैसे लगेंगे तो पैसे दूँगा। लगभग पंद्रह सौ के ऊपर बताया, पंद्रह सौ, दो हजार, ढाई हजार, पूरी तरह याद नहीं। मैंने कहा, महाराज जी, इतने लगते हैं क्या। नहीं करना। अरे रुको, मैं आता हूँ। आए, बोले, चलो, बिना पैसे का करवाता हूँ। खड़ा कर दिया। अंदर गया, दर्शन किया। आसपास विद्वान लोग बैठे थे। बोले, इनसे मिलना है। मैंने कहा, महाराज जी, इनसे मुझे नहीं मिलना। जिससे मिलने आया था, मिल लिया। फिर लेप दिया। बद्रीनाथ को लेप लगता था। बोले, रख लो। मैंने कहा, महाराज जी, एक कपड़े में रहता हूँ। जीवन भर के लिए रख रहा हूँ। मैं उसे खा लिया। बोला, ये जिंदगी भर के लिए मैंने रख लिया। और वो क्या करते थे। हटो हटो। महाराज जी केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए हैं। मैंने कहा, महाराज जी, मैं केदारनाथ चढ़ा था पैदल, लेकिन केदारनाथ से बद्रीनाथ गाड़ी से आया। ये बात उन्हें आखिरी तक समझ में नहीं आई। यही बोलते रहे। भीड़ हटाओ। भीड़ भी कुछ नहीं बोलती थी। हटो हटो, महाराज जी केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए हैं। दर्शन कराया, बाहर ले गए। बोले, कहाँ रुकोगे। मैंने कहा, होटल में। बोले, होटल में रुक जाओ। चलो, भोजन कराते हैं। मैंने कहा, महाराज जी, आप भी खा लीजिए। बोले, नहीं, मैं नहीं खाऊँगा, भूख नहीं है। आगे गए। मैंने कहा, आप भी खा लेंगे तो अच्छा है। अकेले खाना जमता नहीं। कोई साथ में हो तो खाए। बोले, देखो, ये नाटक मुझे पसंद नहीं। एक अन्न भी नहीं खाऊँगा। मैंने कहा, महाराज जी नाराज हो रहे हो, छोड़ो, जाने दो। होटल में गए। वो बोल रहे, महाराज जी केदारनाथ पैदल आए, बढ़िया खाना लगाओ। मुझे उन्हें आड़े लेकर जाना पड़ता था, सामने नहीं। मैं गाड़ी से आया हूँ। आखिरी तक ये बात समझ में नहीं आई। बैठे। मैंने कहा, आप भी खा लो। बोले, मुझे नाटक पसंद नहीं। उठे और चल दिए। भोजन आया, मैंने किया। बिल देने गया। होटल वाले से पूछा, महाराज जी को जानते हो। बोले, नहीं जानते। और जैसे ही बिल देने गया, वो आ गए। बोले, पैसा है कि दूँ। मैंने कहा, है। कहाँ रुकोगे। बगल में ही कमरा था। पैन कार्ड दिखाया। रूम ले लिया। वो चले गए। सुबह गरम कुंड में गया। महाराज जी वहाँ थे। मैंने कहा, महाराज जी, जय माता दी। कुछ बोले ही नहीं। लगा, नाराज हो गए। मैं किसी को ज्यादा नहीं मनाता, एक से दो बार। फिर चला गया बद्रीनाथ के मंदिर। कहा, बाहर से दर्शन कर लेते हैं। ऐसे किया। आँख खोली, नजर गई, पीछे खड़े हैं। बोले, कब से खोज रहा हूँ। जब जय माता दी बोला, तब जवाब नहीं दिया, और कह रहे हैं कब से खोज रहा हूँ। फिर बोले, चलो, लक्ष्मी का दर्शन कराते हैं। ले गए। प्रसाद दो, महाराज जी को। केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए। मैंने कहा, भगवान, मैं क्या कहूँ इनको। इतनी बार बोला। फिर दर्शन कराते रहे। हटो हटो, केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए हैं। बस यही उनका पॉइंट था। मैं बोल भी रहा था, महाराज जी, मैं गाड़ी से आया हूँ। वो माने नहीं। फिर बोले, एक काम करो, रुक जाओ। मैंने कहा, महाराज जी, मैं रुकूँगा नहीं। बोले, नहीं, रुक जाओ। मैंने कहा, कपड़ा मैं धोता हूँ, नीचे रखता नहीं। कपड़ा कौन पकड़ेगा। बोले, मैं हूँ ना, मैं कपड़ा पकड़ूँगा। और पता है, मैं तुम्हारे लिए साबुन लेने गया था। तेल लाया हूँ। मैंने कहा, महाराज जी, मैं नहीं रखूँगा। मैं पक्का जाऊँगा। बोले, चलो, मेरी कुटिया में चलो। कुटिया में गए। बोले, तुम्हें पैसा चाहिए। उसी समय मेरा पैसे का अहंकार खत्म हो गया। कॉपी खोली। बोले, जितना पैसा चाहिए, ले लो। पता नहीं उस पैसे में क्या था। पैसा देखते ही पैसे से छूट गया। पैसे का अहम भाव निकल गया। मैंने कहा, नहीं महाराज जी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। फिर मैंने उन्हें कुछ दिया। जबरदस्ती तब उन्होंने लिया। फिर खिलाया-पिलाया, मेरे साथ दिया। बोले, तुम्हें पता है रात को कहाँ गया था। बस स्टैंड पर। एक तरफ रोक भी रहे हैं, एक तरफ रात को ही बस देख के आए हैं। ये पॉइंट बाद में समझ में आया। रास्ते में पूछा, महाराज जी, आपका नाम क्या है। बोले, मेरे को ऐसा बकवास अच्छा नहीं लगता। मैं तुमको नीचे मिलूँगा। ना नंबर है, ना नाम है। मिलेंगे कैसे। फिर बोले, चलो, बस पकड़ाता हूँ। चाय की दुकान पर गए। बोले, बढ़िया चाय बनाओ, टोस्ट दो। फिर भी कह रहे, महाराज जी केदारनाथ से बद्रीनाथ पैदल आए। लेकिन वो ड्राइवर वहीं खड़ा था, जिसने मुझे छोड़ा था। पैसा नहीं ले रहा था, तो चेहरा पहचान रहा था। मैंने कहा, महाराज जी, इधर आइए। ड्राइवर यहीं है। चाय अच्छा बनाओ। केदारनाथ बद्रीनाथ छोड़ो बोलना। खाया। बोले, जो इच्छा हो, मन हो, खा लिया करो। फिर बोले, बस पकड़ के चले जाना। चले गए। बस आने से पहले वो आ गए। बोले, बस आ रही है। बस में बैठा दिया। टंकी से थोड़ा दूर बस रुकी। मैं सीट पर बैठा था। देखा, महाराज जी चढ़ के वापस आ गए। बोले, पैसे वैसे हैं तुम्हारे पास। मैंने कहा, हैं, ठीक है। बस चालू हो गई। नीचे से बोले, मुझे सुबह पता चला कि तुम बहुत अच्छे संत हो। रात को पता चलता, तो अपनी कुटिया में रोकता। सुबह पता चला तुम्हारे बारे में। मैंने कहा, महाराज जी, अब आशीर्वाद दे दो। खिड़की से सर झुकाया। उन्होंने सर पर हाथ रखा। बस निकल गई। मैंने पीछे मुड़ के देखा। मेरे बस के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। जिंदगी में ऐसा पहली बार हुआ। मेरे लिए कोई इतना, जिसे मैं जानता भी नहीं। रास्ते भर उनको देखना चाह रहा था। उतर नहीं पाया। और आज तक वापस जा नहीं पाया। उसके बाद चित्रकूट वाले मिले। और आखिरी में नर्मदा तट पर मिले। ओंकारेश्वर में सब छूट गया था। कहीं जाने के लिए नहीं था। सब खत्म हो गया था। ऐसे ही रो रहा था। आँखों में आँसू। एक महाराज जी रोड के उस पार। मैं उन्हें देखा, वो मुझे देखे, और हम दोनों एक-दूसरे की तरफ खिंच गए। वहाँ पेड़ था, चौतरा था। बैठ गए। बातें करने लगे। उनके पास एक मोबाइल था। मैंने कहा, देखो महाराज जी, मुझे आत्मज्ञान चाहिए। बोला, आप क्यों मोबाइल रखे हो। बोले, तुम कहो तो अभी फेंक देते हैं। मैंने कहा, पक्का फेंक दोगे। बोले, हाँ, फेंक देते हैं, लाओ। मैंने कहा, रुको, फेंको मत, लाओ। फिर बोले, चलो मेरे साथ चलो। जाते-जाते एक होटल आया। बोले, चलो नाश्ता कर लेते हैं। भूख मुझे बहुत लगी थी। मैं पैसा निकालने एटीएम पर गया था, पैसा निकल नहीं पाया था। होटल में पूछा, भोजन करना है, थाली कैसे है। दो सौ, ढाई सौ रुपये की थाली बताई। मैंने कहा, कार्ड से दे देंगे। फिर कहा, छोड़ो, नाश्ता ही करते हैं। नाश्ता किया। नाश्ता के बाद होटल वाले ने पैसा नहीं लिया। आगे बढ़े, तो उन्होंने कहा, एक बात बताओ, तुम्हारा एक करोड़ में हो जाएगा। मैंने कहा, क्या करोड़। बोले, आश्रम। मैंने कहा, महाराज जी, मुझे आत्मज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए। पहले आत्मज्ञान, बाद में कुछ और। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए। साथ-साथ चलते रहे। वो समझाते रहे। बार-बार पैसा पूछते थे, एक करोड़ में तुम्हारा हो जाएगा। मैं वही कहता, आत्मज्ञान के अलावा कुछ नहीं। क्या समझाया, मुझे याद नहीं है। पॉइंट बता रहा हूँ। एक मंदिर में रात रुके। सुबह उठे। बोले, अब से तुम मिले हो, तुम्हारा पूजा-पाठ लेट हो रहा है। ऐसे ना हो कि मैं ज्यादा दिन रुकूँ, तुम्हारा सब छूट जाए। हाँ, मैं जिसके साथ ज्यादा दिन रहता हूँ, उसका सब छूट जाता है। मैंने कहा, महाराज जी, परिक्रमा क्यों कर रहे हो। परिक्रमा से क्या होता है। सुबह पूजा करने जा रहे थे। हम भी बैठे, वो भी बैठे। उन्होंने मेरे पाँव छुए, प्रणाम किया। वो बुजुर्ग थे। जब मेरे पाँव छुआ, तो मैंने उनके पाँव छुए। बोले, पता है, तुममें मैंने कुछ देख के तुम्हारे साथ चला है। मैंने कहा, महाराज जी, मैंने भी आपमें देख के ही चला। फिर उन्होंने कहा, तुम्हें पूरे भारत में कोई आत्मज्ञान करवा नहीं सकता। रास्ते में मेरे पास पैसे नहीं थे। चप्पल काट रही थी, तो एक-दो ब्लेड के लिए उनसे पैसे लिए थे, बाद में देने थे। उस समय कहा कि पूरे भारत में कोई नहीं करवा सकता। तो अब मैं जा रहा हूँ। शाम का समय। लगभग नौ किलोमीटर पैदल जाना है। जेब में एक रुपया नहीं। एटीएम तक पहुँचने के बाद पैसा मिलेगा। मेरी आदत जल्दी लिफ्ट माँगने की नहीं है। चला जाता हूँ, धीरे। कोई पूछ के बैठा हो तो ठीक। बहुत थक गया, तब माँग लेता हूँ। बोले, रुको। मैंने कहा, नहीं। अब नहीं रुकेंगे। जब होगा ही नहीं, तो रुकना क्यों। समय नहीं है। चला गया। दो-तीन किलोमीटर बाद एक लड़के से पूछा, मुझे बेड़िया जाना है। रावेर, खेड़ी, नर्मदा तट। बात होने लगी। दो लड़के आए थे, उसी गाँव के। खूब बातें हुईं। वो बोला, लगता है महाराज जी, मुझे आपको छोड़ना पड़ेगा। बाजीराव पेशवा की समाधि देखी क्या। मैंने कहा, नहीं देखी। बोले, चलो, वहाँ घुमाता हूँ, फिर छोड़ दूँगा। वहाँ महाराज जी रुके हुए भी थे। बगल में आश्रम था। महाराज जी से फिर मिलना हो गया। मैंने सोचा, इनका थोड़ा है, दे दूँगा। इस लड़के से ले लूँ, बाद में एटीएम से निकाल के दे दूँगा। महाराज जी रास्ते में कई बार बोलते थे, मुझे आज नर्मदा तट पर कुटिया बना के रहना है। मैंने उस लड़के से कहा, आप महाराज जी के लिए कुटिया बना दोगे क्या। बोला, हाँ, बना दूँगा। वहाँ शिव मंदिर है। वो शिव मंदिर जाने लगा, तो महाराज जी पीछे हो गए, मैं और वो लड़का आगे। महाराज जी ने पीछे से कहा, भक्त और भूत के चक्कर में पड़ना मत। किसी के होते नहीं हैं। भक्त मिल गए, आगे चले गए क्या। मैंने कहा, अरे महाराज जी, ऐसी बात नहीं है। आगे जाके मैंने कहा, महाराज जी, ये कुटिया बना देंगे। बोले, ये क्या बनाएगा कुटिया। जितना बोलो, मैं बना देता हूँ। ये कुटिया बनाएगा। फिर मैंने उस लड़के से पैसा ले के महाराज जी को देने लगा। महाराज जी ने पैसे नहीं लिए। फिर मैं वहाँ से चला गया। मुंबई चला गया। फिर मुंबई से उसी स्थान पर आया। फिर वहाँ से नर्मदा तट की यात्रा की। फिर रोते-रोते मुंबई गया। फिर गुजरात गया। फिर गुजरात से नर्मदा तक आया। ऐसे में पता नहीं क्या हुआ। प्रश्न फट गए। उत्तर हो गए। ये तीन लोग अद्भुत थे। इन्हें हम क्या नाम दें। कोई शब्द का उपयोग नहीं कर सकता। अद्भुत थे। पहले बद्रीनाथ मिले, तो बोले, नीचे मिलूँगा। उसके बाद चित्रकूट, जल्दबाजी मत करो। फिर नर्मदा तट पर ये मिले। ये मेरा आखिरी मिलना था। तीनों अद्भुत थे। तीनों का किसी से मतलब नहीं था। पर तीनों ने मेरी सेवा की। तीनों का नाम मुझे पता नहीं। बद्रीनाथ वाले तो अद्भुत थे। एक आदमी, जिसको मैं जानता नहीं, मेरे लिए पागल हो गया। पैसे का अहंकार भी उन्होंने तोड़ा। ऐसे लोग हैं भारत में। तीन मुझे मिले। शब्दों में उनको नाम भी नहीं दे सकता। नर्मदा तट वाले अभी भी हैं कि नहीं, फिर मिला नहीं। पता ही नहीं। नाम ही नहीं पता। कहाँ से आए, कहाँ गए, पता नहीं। समाज में कोई परिचय नहीं। किसी के द्वारा भी वहाँ पहुँचा जाए, ऐसा नहीं। तीनों जन अद्भुत थे। आत्मज्ञानी मुझे कोई नहीं मिला। इसलिए ये तो अद्भुत थे। इनके बारे में क्या बोलूँ। और अपने आप हुआ। कोई करवाया नहीं। अपने आप हुआ। ये मेरी आखिरी परीक्षा चल रही थी। पृथ्वी पर मुझे कहीं रहने की जगह नहीं थी। तब मुझे एक करोड़ देने के लिए तैयार थे। उपनिषद पूरी नहीं पढ़ी। मैं बहुत कुछ नहीं पढ़ा। भगवत गीता पढ़ी थी। ज्ञान अपने आप प्रकट हो गया। जैसे ही आत्मज्ञान आया। 2010 में शायद भगवत गीता पढ़ी थी, और कई किताबें पढ़ीं। अगर आप खोजी हो, तो लोग आपकी सहायता भी करते हैं। समय आने पर मदद करते हैं। लेकिन ये अद्भुत होते हैं। इन्हें आप बुद्धि के स्तर से नहीं समझ पाओगे। ये अद्भुत होते हैं, पागल होते हैं। बुद्धि के स्तर से समझा भी नहीं जाएगा। तीन हमारे जीवन में ऐसे मिले। मेरे प्रश्न खत्म हो गए। दो लोग सफेद में मिले थे, नीचे भी सफेद, ऊपर भी सफेद। एक गेरुआ में मिला था। इसके बारे में और बोला हूँ। मेरा एक वीडियो है, योगी जी की आत्मकथा, आध्यात्मिक प्रतिज्ञान, योगी चैनल। ढाई घंटे के ऊपर का है। तीन मुझे मिले। तीन बहुत है, प्रमाण। और वो भी लगे हुए हैं। जब उनको कुछ दिखा, तो उन्होंने जितनी मदद कर सकते थे, की। एक ने मुझे आखिरी में जाँचा, लालच है या नहीं। एक ने कहा, तुम संत हो, मुझे सुबह पता चला। एक ने कहा, जल्दबाजी मत करो। वो मेरा आखिरी समय था, 2019 की दिवाली के पहले का। और 2020 में हो ही गया, शुरुआत में लगभग।

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वीडियो: कैसे पता चलेगा कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है ? / योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-18