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प्रश्नोत्तर P5-0017 · भाग 5

(कुटिया में साधिका) उस (युवक) में समझ तो है, बस वो चल नहीं रहा — हम कैसे निर्णय कर सकते हैं, हो सकता है वो पहुंच ही गया हो और ऐसे ही सबको खींच रहा हो, परीक्षा ले रहा हो? और वैसे हमारी स्थिति का कोई शायद अनुमान भी नहीं लगा पाएगा।

अरे भाई, ऐसा होता है — मैं खुद ऐसा किया हूं, मैं खुद ऐसा करता हूं। मुझे आपकी स्थिति के बारे में निर्णय नहीं करना है। मुझसे आपने कुछ पूछा, मेरा काम है आपको जवाब देना; आप कौन हैं, क्या हैं, इससे मुझे मतलब नहीं। (स्थिति का अनुमान —) लगाना ही नहीं चाहिए। (जो भी अनुमान लगाएगा,) वो अपनी स्थिति से लगाएगा ना। चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष — यहां पे एक स्त्री, एक पुरुष, बचपन से लेके वृद्ध तक, खड़ा कर दो, और बोलो इन दोनों जनों के बारे में लिखो — सब अलग-अलग लिखेंगे; और है एक ही। सामने तो एक ही है, (तो) अलग-अलग क्यों लिख रहा है? जैसी जिसकी स्थिति रहेगी, वो उसके बारे में (वैसा) लिख देगा। आपने सुना है — 'जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि' — लेकिन ये गलत है, ये सेंटेंस ही गलत है। 'जैसी स्थिति, वैसी सृष्टि।' दृष्टि के पीछे वाला कोई है — जैसी उसकी स्थिति होती है, वैसा वो देख पाता है। आंखें तो वही की वही रहती हैं। जो इस कैमरे में झांक रहा है, (उस) झांकने वाले की जैसी स्थिति रहेगी, (वैसा देखेगा)। अगर वो डरा हुआ है, तो बाहर भी डर दिखेगा; उसके अंदर जैसी स्थिति है, सामने वाले को वैसा देखेगा। ये मार्केट में सेंटेंस है — 'जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि' — लेकिन ये सेंटेंस ही गलत है; जैसी आपकी स्थिति, वैसी सृष्टि। मैं ये कह रहा हूं, क्योंकि आंखों के पीछे कोई है, जैसी उसकी स्थिति होती है; और जैसी आपको बाहर से समझ मिलती है। जैसे आपको मित्र कभी शत्रु लगता है, और शत्रु कभी मित्र भी लगता है — ऐसा हुआ है जीवन में? आंखें तो वही की वही हैं — देखने वाले की स्थिति क्या है? आंखों का काम है दिखाना, बस — आप बंद कर लोगे, तो नहीं दिखेगा; (आंखें) एक निमित्त (हैं), डिसाइड करने वाले (आप) हैं।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17