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प्रश्नोत्तर P5-0006 · भाग 5

(कुटिया में एक साधिका, जो प्रोफेसर रही हैं, युवक के प्रश्न पर) — हो सकता है शादी न करने वाले भी वो काम कर लेते हों; पर जरूरी तो नहीं हर कोई कर रहा होगा, अपवाद भी तो होता है। कोई कहता है 80% हो रहा है, कोई कहता है 1% — इसमें सही क्या है?

(युवक से) चलिए बेटा, आपसे पूछ रहा हूं — आपने शादी नहीं की, शादी वाला काम किया — हां या ना, बस खत्म। (साधिका से) आप तो प्रोफेसर रही हैं, (उसी उम्र के) युवा ही आप तक पहुंचते हैं, तो आपको तो इसके बारे में बहुत अच्छा नॉलेज है; और आप अभी कह रही हो — 'हो सकता है'। अपवाद होता है — (पर) उस अपवाद के पीछे भी कुछ है; अपवाद के लिए भी आधार, बेस चाहिए। अपवाद ऐसे नहीं होता। कल्पना के लिए भी कोई आधार-बेस चाहिए — आप सोचो, मैं कल्पना कर लूं, (पर) आधार-बेस नहीं होगा, तो कल्पना नहीं कर सकते। तो अगर अपवाद है, तो इसका मतलब कुछ तो है। मैं कह रहा हूं, कोई कह रहा है 80% — (तो) वो ऐसे ही बता रहा है; हो सकता है 1% हो, लेकिन है। आप परसेंटेज में कतई मत जाइए, क्योंकि परसेंटेज में अगर जाएंगे, तो कुछ नापा नहीं जा सकता — जनसंख्या तक नापी नहीं जा सकती, क्योंकि जनसंख्या नापते-नापते हर सेकंड कई लोग जा रहे, कई लोग आ रहे हैं। यहां कुछ भी पूर्णतः बोला ही नहीं जा सकता। कोई कह रहा है 80% हो रहा है, कोई कह रहा है 1% — मुझे उससे नहीं लड़ना है। क्योंकि आप जिस सोसाइटी में रहते हो — आप अलग सोसाइटी में रहते हो, मैं अलग सोसाइटी में रहता हूं; आप अलग जीवन जी रहे हो, मैं अलग जी रहा हूं; आप अलग समझ पा रहे हो, मैं अलग समझ पा रहा हूं; आप अलग देख पा रहे हो, मैं अलग देख पा रहा हूं — आप 1% तक पहुंचे, मैं 80 तक पहुंच गया। तो मैं उससे लड़ूंगा नहीं। खंडन तो कभी किसी का करना ही नहीं चाहिए। जीवन में एक बात याद रखना — अगर आपको निकलना हो, तो कभी किसी का खंडन मत करना। अगर आपने खंडन किया, तो आप कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऐसे ही छोड़ देना उसको — अपनी दृष्टि से आपने अपनी बात रखी, मैंने अपनी बात रखी, ठीक है, बात खत्म। खंडन करने वाले की यात्रा स्व तक नहीं होती है, वो खंडन ही करता रहता है — (उसमें) फंस भी जाता है; क्योंकि जिसका आप खंडन कर रही हो, अगर उसने स्वीकार नहीं किया, तो उसने आपके प्रति द्वेष बांध लिया ना; (उसका) एंड भी नहीं होता; अब आपको नेगेटिव ऊर्जा वो देगा — काश आप खंडन ना किए होते! अब मुझे (उससे) क्या लेना-देना? 1% हो, 80% हो, क्या फर्क (पड़ता है)? अपवाद के लिए भी कोई आधार-बेस होगा। इसलिए मैंने आज तक किसी का खंडन (नहीं किया) — खंडन करना ही नहीं चाहिए, कभी भी नहीं; वाद-विवाद उठ जाता है, फंस जाओगे आप — अगर आपको निकलना है तो। और आपको कुछ बनना है, तो करो खंडन — वो पांडित्य का प्रदर्शन है; करो खंडन, शास्त्रार्थ करो। स्व की यात्रा करने वाला और आत्मज्ञानी, ये शास्त्रार्थ नहीं करते; ये अपनी बात कह देते हैं, और कहने में सिद्ध हो जाता है — आप समझो या ना समझो। (और जो) नहीं समझोगे, (तो) प्रयास नहीं करेंगे। जैसे कुछ देर पहले हमने कुछ बात कही, (और) उसके बाद कहा — 'समझ सको तो'; तो इन्होंने नहीं समझा, तो हमने प्रयास भी नहीं किया, क्योंकि अभी इनका वो लेवल नहीं है। मैं प्रयास करूंगा, (तो) ये अपसेट हो जाएंगी, और पूरी रात निकल जाएगी। अगर इनको समझना होता, (तो) उसी समय समझ लेतीं; और अगर समझना चाहतीं, (तो) मुझसे — नहीं समझ में आया — (कहकर) क्वेश्चन करतीं। मैंने कुछ कहा, और आपने रिटर्न में प्रश्न नहीं किया, तो इसका मतलब समझने की जिज्ञासा भी नहीं है। (तो) मुझे रिटर्न कुछ नहीं बोलना चाहिए, मुझे सिर्फ मुस्कुरा देना चाहिए, वेट करना चाहिए — (जब) स्थिति उठेगी, (जब) भीतर से जिज्ञासा होगी, तभी जानने की इच्छा होगी। अरे भाई, अगर समझने की क्षमता ही नहीं है — समझने की क्षमता कोई किसी को दे नहीं सकता। बात को समझने के लिए बोला जा सकता है, समझाया नहीं जा सकता। आप बस अपनी बात को रख दीजिए, समझाने का प्रयास मत करिए। एक बार आपने बोला — (जिसे) समझना होगा, (उसे) समझ में आ जाएगा। अगर नहीं समझ में आया, और समझने की इच्छा होगी, जिज्ञासा कहेगी 'मुझे समझाइए', तब आप फिर बोलिए, अलग-अलग तरीके से। सिखाने वाले को तब तक नहीं भागना चाहिए, जब तक सीखने वाला तैयार है।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17