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प्रश्नोत्तर P5-0004 · भाग 5

(वही साधिका) मां बताती हैं कि बचपन में मैं विषखोपड़ा उठाकर मुंह में डाल रही थी — अब नहीं डालूंगी, क्योंकि समझ मिल गई। बच्चे के अंदर भूख तो नेचुरल थी... (इससे क्या समझें?)

बच्चे के अंदर भूख है — खाना नहीं भूला, सफाई करना हम भूल गए; गड़बड़ी ये हो गई। खाना नहीं भूल पाए, हम धोना भूल गए — देखो बच्चे, खाना याद है, (पर) ऐसे धो, ऐसे धो (सिखाना पड़ता है)। हमें बंधन बांधना खूब याद है, (बंधन) निकालना-छुड़ाना नहीं आता — इसके लिए गुरु चाहिए, जैसे मल-मूत्र धोने के लिए मां चाहिए; मां ही सिखाती है ना। काश मैं नेचुरल जीता! जैसे आप बड़े हो गए, तो हमें जरूरत में जीना चाहिए ना — हम लालच में क्यों गए, संचय में क्यों गए, बड़ा बनने में क्यों गए, बेईमानी में क्यों गए, हम नेचुरल क्यों नहीं जिए? अगर आप नेचुरल जीते, तो पहुंच जाते। (अब भी) नेचुरल आप जियो ना, तो आप पहुंच जाओगे। ये शरीर ही मिला है उससे मिलने के लिए; लेकिन आप ही ने कर्मों का बंधन बांध दिया, आप ही ने बीमारी करके बांध दिया। आपने कुछ ऐसा किया कि आपका जीवन अशांत हो गया — वही कर्म बोल रहे हैं। कर्म कर्म होता है, आप चाहे अच्छा करो, चाहे बुरा। (ऐसा ज्ञान मिल गया तो निकाल लेंगे —) आप निकाल लेंगी। जैसे मां ने सिखा दिया कि मल-मूत्र को कैसे साफ करना है — आज भी मल-मूत्र हम करते हैं, लेकिन गंदगी नहीं लगी है; लेकिन बचपन में जब मैं नहीं सीख पाया था, तो फिर वही मल-मूत्र हाथ में लेके, हो सकता है उसी को खाने में लग जाए, छोटा बच्चा तो कुछ भी (कर ले), क्योंकि उसके पास वो समझ नहीं है; लेकिन खाने वाली समझ है — देखिएगा। हमारी जरूरत की वजह से हम खाना सीखे, लेकिन धोना हमें याद नहीं है। वैसे ही हमने क्या किया? लालच में आके बंधन बांधने लगे, लेकिन छुड़ाना मुझे नहीं आता — उसके लिए गुरु चाहिए। मुझे बांधना खूब आता है, और बंधवाने वालों की संख्या तो बहुत है, लेकिन छुड़ाने वालों की संख्या बहुत कम है, उनकी बातें समझ में ही नहीं आतीं। तो जैसे मल-मूत्र धोना आपको मां ही सिखाएगी — और कोई अगर सिखाए, तो घिन आएगी, समझिएगा — तो ऐसे ही सद्गुरु बहुत कम हैं। वो आपके कचरे को कैसे धोना है, कैसे विकारों से मुक्त होना है, वो आपको सिखाएंगे; क्योंकि उसमें बड़ी मेहनत लगती है, इसलिए सब नहीं करते हैं। (और) वही करवा सकता है, जिसे कुछ नहीं चाहिए — वही (जैसे) मां बच्चे को पालती है; अगर उसे कुछ नहीं चाहिए, तभी पाल पाएगी; अगर कुछ चाहिए, तो फिर अलग तरीके से पालेगी, जिस तरीके से बच्चे को लालच आ जाए, तो वो भी सही ज्ञान नहीं दे पाएगी। गुरु एक स्थिति है — लालच से मुक्त हुआ, तब जाके गुरु-स्थिति है। (बहुत से गुरु हैं जो नहीं हैं —) वो बने हुए गुरु हैं। अगर कोई (बच्चे को) गोद ले ले, आप उसे मां बोल देंगी — (पर) कोई गोद ले ले, तो वो मां हो गई क्या? मां तो (वो), जब उसके अंदर से ममत्व पैदा होगा — ऐसा नहीं कि शरीर से पैदा होगा — ममत्व जब पैदा होगा, और उसे उस बालक से कुछ नहीं चाहिए, उसे मां कहा जा सकता है। (मां को भी तो भविष्य की कल्पना करके चाहिए —) मैं मां की बात कर रहा हूं, मैंने मां की व्याख्या कर दी — भविष्य की कामना करने वाली मां नहीं है; (मां में) तो कामना नहीं रहती।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17