प्रश्नोत्तर P4-0197 · भाग 4
(वही साधिका) एक ज्ञान मार्ग है, एक भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग के लोग अंधविश्वास में पड़ते हैं, ज्ञान मार्ग में पूजा-पाठ, मंत्र-जप, टीका कुछ नहीं। पर विवेकानंद ज्ञानी थे, रामकृष्ण परमहंस भक्ति मार्ग के — दोनों में भेदभाव नहीं था। हम इसी उलझन में पड़ते हैं कि कौन श्रेष्ठ है; मेरा तो भक्ति मार्ग से भरोसा ही उठ गया है।
मैं तो ज्यादातर समाज में उन लोगों की संख्या देखता हूं — जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछ रहे हैं; उन्हें खुद ही पता नहीं जाना कहां है, बस चले जा रहे हैं। (भक्ति मार्ग से भी बहुत लोग पहुंचे हैं —) ये देखना है कि आपका किसमें (मन) है, वो अपना (देखो)। (मुझे ज्ञान वाली बात ज्यादा समझ आती है —) निकल लो। सबकी समझ अलग-अलग है, सबकी तासीर अलग-अलग है, सबका नेचर अलग-अलग है।
मैं एक घटना बता रहा हूं — मैं कामाख्या जा रहा था, (एक) बंगाली बाबा (साथ थे)। तो मैंने टू-टायर एसी का टिकट करा दिया था। रास्ते में मुझे बोले — यार, बड़ी घुटन हो रही है इसमें, खिड़की भी नहीं, हवा (नहीं) है। तो कहने का मतलब है कि ज्यादा सुख में भी आदमी अगर नहीं जिया है, तो उसे नर्क लगता है। अब मुझे अगर खिड़की वाले में ले जाओ, तो मुझे नहीं जमेगा; उन्हें (एसी) नहीं जमा। और बात बता रहा हूं — उनको मैं टू-स्टार, थ्री-स्टार होटल में भोजन कराता था, बढ़िया भोजन, एक टाइम का कम से कम 500-700 लग जाते थे; हम कई दिन रहे। तो जिस दिन आना था, उसके एक दिन पहले उन्होंने कहा — आज मैं (बाहर) भोजन करके आऊं क्या? मैं बोला हां, करके आइए। वो आए, बोले — आज दिल खुश है, 50 में पेट भर के खाए! अब आपको मैं बता रहा हूं, जितने में (उन्होंने) भोजन किया, उससे ज्यादा (की) वहां (एक) रोटी थी — नान, तंदूरी रोटी 18-20 की एक; वो (वहां) पापड़ खा रहे थे, सूप पी रहे थे, आइसक्रीम खा रहे थे, तड़का दाल, दाल फ्राई, जीरा राइस — लेकिन कभी तृप्त नहीं (हुए); ₹50 में आज तृप्ति मिली, चेहरे पे खुशी भी थी — बोले आज पेट भर खिलाया, और रोटी में घी भी लगाया था। अपना-अपना स्वाद है। आपकी जहां आदत पड़ गई है, आप जिसमें जिए हो, आप किस सोसाइटी में जिए हो, कैसे रहे हो, वो देखना है।
खजुराहो में (एक) रिक्शा वाला — हमारी एक आदत है कि अगर कोई भी साथ है, चाहे रिक्शा वाला हो, कोई भी गाड़ी वाला हो, हम उसके साथ भोजन करते हैं, अकेले नहीं खा पाते, उसको साथ में खिलाते हैं। तो होटल में गए, मंचो सूप वन-बाय-टू करा दिया; उसने एक चम्मच लिया, चेहरा बिगड़ गया; बोला — मुझे अच्छा नहीं लग रहा, मुझे समोसे दिला दो। ₹80 का सूप, 1/2 ₹40 — लेकिन वो ₹10 में खुश हो गया, बोला ये बहुत अच्छा है। तो अपना-अपना टेस्ट, अपना-अपना स्वाद — आपको किसका टेस्ट जम जाता है, किसकी बात समझ में आ जाती है। लेकिन मेरा क्या कहना है? लेके निकलो — बात ये है, बस ऐसे टेस्टर मत लेते रहो। उसके आगे भी कोई काम है — अरे भाई, आप लेके आगे बढ़ो, आपकी यात्रा होनी चाहिए।
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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17