प्रश्नोत्तर P4-0178 · भाग 4
(वही साधिका) हम बहुत बेईमान हैं और यह बेईमानी हमें दिखती भी नहीं; रायता तो फैला ही दिया है, हमारे हाथ में समेटना नहीं है, पता भी नहीं कितना बिखेर लिया। अब क्या करें?
मैं कह रहा हूं, जितना भी बिखेरा, कम से कम (उसे) छोड़ना तो चालू करो। आगे से ना (बिखेरो) — कहीं ना कहीं शुरुआत तो करो। ऐसा ना हो कि सोचते रहो और फैलाते रहो। भाई, रुक तो जाओ; रुकने से भी कम से कम आगे का तो नहीं फैलेगा। (हम तो फैलाने के आदी हो गए —) रुक गए तो छूटने लगेगा ना। रुक गए तो आगे का तो कम से कम नहीं होगा। जैसे एक वृक्ष है — उसमें कली से फूल बनता है, फूल से फिर फल बन जाता है, और फल जैसे ही अपने आकार में आता है, जब उसका बढ़ना रुक गया, फिर वहां से खत्म होना चालू होता है, और एक दिन वो खत्म हो जाता है। तुम रुक तो जाओ — रुक गए तो अपने आप में आने लगे। प्रकृति का नियम यही है — पहले वही फल बढ़ रहा था ना, उसका बढ़ना रुक गया, तो फिर वो नाश की तरफ बढ़ने लगा। तो कहने का मतलब — आप बस रुक जाओ; रुकना आपको है। क्योंकि फल का तो अंत है, लेकिन आप जहां चल रहे हो, उसका अंत ही नहीं है — भवसागर है; क्योंकि आप परिवर्तनशील में चल रहे हो, तो आप चलते रहो, उसका अंत नहीं है, (ना) आदि (है, ना अंत)। (हम वही चक्कर काटते रहते हैं —) आप रुक गए, तो फिर आप वापस आने लगे। आप जहां चल रहे हो, वहां आदि-अंत है ही नहीं, तो चलते रहो (तो चलते ही रहोगे)। मूल (में आने के लिए) आपको रुकना है। रुक गए, इसका मतलब अपने आप में होने लगे। अब अपने आप में होने तो लगे — शांति होगी, (और) छूटने का घुटन होगा। पूर्णता से अपने आप में तब हो पाओगे, जब पूरी तरह छूट जाओगे — तब पूर्णता का एहसास होगा। जब तक कहीं लगे हो, कहीं ना कहीं आप अपूर्ण हो। समझ तो बढ़ती जाएगी, शांति भी बढ़ती जाएगी, (और) एक तरफ छूटने का घुटन भी बढ़ेगा — दोनों साथ। कोई चीज निकल रही है, तो वो खाली (जगह) कोई भर भी तो रहा है ना — एक तरफ से वो छूट रहा है, तो एक तरफ आप अपने आप में आ भी तो रहे हो; ऊर्जा आप में आ रही है ना, क्योंकि ऊर्जा कहीं लग रही थी, वहां से हट गई, तो अपने आप में हो गई। कहीं ना कहीं आप शांति भी महसूस कर रहे हो, कहीं ना कहीं अशांति भी महसूस कर रहे हो — दोनों काम साथ ही।
तो लगे रहो। कब तक? जब तक उपलब्धि ना हो जाए। दिन, महीना, साल कुछ मत गिनो। ये गिन रहे हो, इसका मतलब आपको जाना है क्या? अगर हम दिन गिन रहे हैं, साल गिन रहे हैं कि यार, इतने साल तो हो गए, मुझे इतने महीने आए हो गए, नहीं हुआ — जब इसका समय निश्चित होता, तब आप समय गिनते तो ठीक था। यहां तो ये निश्चित है कि आप छोड़ोगे और हो जाएगा — छूटा कि हुआ। तो उसमें ताकत लगाओ; दिन क्यों गिन रहे हो, महीना क्यों गिन रहे हो? हमें तो अपनी पूरी ताकत अपने आप को छुड़ाने में लगानी चाहिए, क्योंकि छूटेगा तब होगा। महीना-दिन से कोई मतलब ही नहीं है। हमें तो मतलब सिर्फ इतना होना चाहिए कि छूटा तो हुआ; नहीं हुआ, तो छूटा नहीं; छुड़ाने के लिए काम करना है, बस, बात खत्म। इतना ईमानदार मुझे होना पड़ेगा, तब इस यात्रा में हम आगे जा पाएंगे; नहीं तो ऐसे तीन महीने गिनते-गिनते — चलो यार, नहीं कुछ हो रहा है। इसमें दिन-महीना, यह सब कुछ मत गिनो। इसमें बस इतना रखो कि भैया, छूटेगा तो हो जाएगा; पूरी तरह छूटेगा, हो जाएगा; हुआ नहीं, तो छूटा नहीं — बस इतनी सी बात है। अब देखो कहां फंसे हो — खोजते रहो, खोजते रहो, खोजते रहो। नहीं दिख रहा है, समझ में नहीं आ रहा — इसका मतलब फंसे तो पक्का।
(जिस दिन थक जाओगे, क्या गुरु दिखा देगा —) गुरु ऐसे नहीं दिखाने वाले। तुम जब खोजते रहोगे, खोजते रहोगे, थकने के बाद जब गिरने लगोगे, (तब हाथ पकड़ेगा)। ऐसे नहीं कि मैं कहां फंसी हूं, (वो) बता दे — क्यों बता दे? फंसाया तुमने, तुम बताओ तुम कहां फंसी हो — क्योंकि तभी तुम्हारी ऊर्जा जागृत होगी ना। फंसे तुम हो, तो तुम्हें क्यों मालूम नहीं है? तुम खोज करो ना, मेहनत करो — एक दिन लगे, चाहे कई साल लगें — आप खोजो ना। कहीं ना कहीं तो हम फंसे हैं; नहीं फंसे होते, तो उपलब्ध हो जाते, एकदम से। इस बात को समझो ना। मेरा काम है खोजने का, मैं खोजता रहूं — इतनी ईमानदारी मुझमें होनी चाहिए; (ये नहीं कि) आप ही बता दो। वो क्यों बता देगा? बता भी देगा, तो वो वैल्यू नहीं होगी मुझे उसकी, मुझे शक रहेगा कि वही बात सही है (या नहीं)। अगर मैं इनको बताता कि आप शरीर में फंसी हो, तो क्या आप मान लेतीं? अगर मैंने आज, दो दिन पहले कहा होता, तो आप कहतीं — नहीं; और आप (बाकी लोग) ही कह देते — यार, इसको शरीर की फिक्र ही नहीं है, जैसा दो वैसा खा लेती है, इसने तो कभी शरीर का ख्याल ही नहीं रखा, ये कब सोती है, कब जागती है। जिस हिसाब से आप इनको देख रहे हो, तो कहते — इसको तो शरीर की फिक्र नहीं है। लेकिन इसको सबसे ज्यादा इसके शरीर की फिक्र है — ये समझ ही नहीं। (अब) निकला, कम से कम पता चला, ये भी अच्छी बात है। पता तो चलेगा ही चलेगा, सब पता चल जाएगा, कुछ बचेगा थोड़ी ना।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30