प्रश्नोत्तर P4-0006 · भाग 4
(लाइव) प्रणाम योगी जी। आपने कहा कि मानसिक कर्म — जैसा सोचो — उसका फल नहीं (लगता), जब तक एक्शन में ना करें। किंतु ऐसा व्यक्ति, जो मन में गलत सोच रहा है, निर्विकार और ईमानदार थोड़े होगा? मानसिक बुरा सोचने वाला अपने आप को रोम-रोम से ईमानदार थोड़े बोल पाएगा? यह समझाएं।
वो ऐसे ही निर्विकार नहीं (होगा); निर्विकार होने के लिए तो सत्कर्म करना पड़ेगा ना। अगर आप कर्म में उतारे ही नहीं, तो आप बेईमान थोड़ी ना कहलाओगे। आपके अंदर बेईमानी आई, ठीक है, लेकिन आपने कर्म में बेईमानी नहीं की, तो आप बेईमानी अंदर आने से बेईमान थोड़ी ना हो जाओगे। फल तो तभी मिलेगा ना, जब मैं एक्शन में (करूंगा)।
(एक होती है सोच, एक होती है मानसिक प्लानिंग —) अगर आप मानसिक प्लानिंग कर रहे हो, तब तो गलत हो। लेकिन सोच आ रही है, और आप एक जगह इच्छा भी रखो कि यार, ऐसी सोच क्यों आ रही है, मैं (इन) सोचों से परेशान हूं — तब तो आप निर्दोष हो; पश्चाताप भी हुआ ना कि यार, ऐसी सोच मुझे नहीं आनी चाहिए थी। जैसे एक पागल किसी को मार दे, क्या उसे दंड है? नहीं। लेकिन समझदार आदमी प्रयास भी कर दे, तो दंड है। तो आप देखिए कि विचार अपने आप आ रहे हैं और आप चाह रहे हो कि ऐसे विचार ना आएं, तब तो ठीक है। लेकिन विचारों को आप बढ़ावा दे रहे हो, उस पर मानसिक काम कर रहे हो, तो कहीं ना कहीं फिर (दोष है)।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01