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प्रश्नोत्तर P3-0152 · भाग 3

गुरु जी, दो-तीन महीने साधना से लग रहा है कि मैं काम-क्रोध से दूर जा रहा हूं; अकेले में लगता है मैं कंट्रोल कर सकता हूं, लेकिन जैसे ही उस परिस्थिति के बीच आते हैं, कंट्रोल नहीं रहता, हम उसके वश में चले जाते हैं — अपने आप कुछ घटित हो जाता है। उस समय क्या करें? मन (माइंड) को कैसे कंट्रोल करें, और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटें?

बंद कमरे में मुझे लगता है कि मैं मौन हूं — यह तो भीड़ में पता चलेगा कि तुम मौन हो या नहीं। जब सामने एहसास करने के लिए कुछ है ही नहीं, तो कंट्रोल तो है ही; पता तो तब चले जब तुम्हारे सामने भोजन आ जाए, तब पता चले तुम्हारा कंट्रोल क्या है। शरीर की जरूरत पर कंट्रोल करके क्या करोगे? आप इस एक बाल पर कंट्रोल करो कि हिले ना — कर सकते हो? प्राकृतिक हिल रहा है, हिलने दो; आपको क्या करना है, वह देखो। बाल हिल रहा है, तुम तो नहीं हिल रहे हो ना। माइंड के पीछे कोई है; माइंड तो जानकारी का आदान-प्रदान करता है। इस आंख के पीछे कोई देखने वाला है — इस आंख को बंद करने से देखने का भाव खत्म नहीं होगा। आंख के पीछे कौन है, उसे समझने का प्रयास करो — वह क्या देखना चाहता है, देखकर क्या करेगा। समझो, कंट्रोल आप कुछ नहीं कर सकते, कंट्रोल छोड़ दो; आपके हाथ में कुछ नहीं है, आपका हाथ भी नहीं है। कंट्रोल का भ्रम है — काहे को कंट्रोल कर रहे हो, काहे को अपने आप को अशांत कर रहे हो, उलझा रहे हो? कंट्रोल छोड़ दो, ईमानदारी से जिंदगी को जियो — है तो उपयोग करो, नहीं तो छोड़ दो। काम एक ऐसा शब्द है जिसमें कर्म से लेकर काम भाव तक सब आता है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटो, वह मैं बता रहा हूं। काम में आपका कर्म आ गया — क्योंकि 'चाहिए' में कर रहे हो; काम भाव भी आया — शरीर को जरूरत है, ठीक है। कोई भी काम करके समय का इंतजार करो, समय से मिल जाएगा। आप जल्दबाजी करते हो — जल्दबाजी में जब परिणाम अपने तरीके से चाहते हो, तो उसमें बेईमानी करनी पड़ती है। काम करो, इंतजार करो, तब काम आपको पीड़ा नहीं देगा। क्रोध तब आता है जब सामने वाला मेरे तरीके से नहीं करता। देख लीजिए उसकी स्थिति-परिस्थिति क्या है — सबकी शरीर की क्षमता, ज्ञान की क्षमता, धन की क्षमता अलग-अलग है। आपने उससे क्या मांग किया है — वह जानकर कर रहा है या उसकी स्थिति ऐसी है? जांच लोगे तो क्रोध नहीं आएगा; या तो आप खुद कर लो। मद से अहंकार आता है। मद किसका होता है — एक रूप का, एक मेरे लोगों का, वैभव का। उसको क्या करो — सत्कर्म में लगा दो, जरूरतमंद में लगा दो। जब भी किसी को नीचा दिखाने के लिए, बड़ा बनने के लिए भाव करते हो, तब यह अहम भाव आता है और आपको गिराकर जाता है। मद, अहंकार, अहम भाव — सब एक ही है। लोभ कब होता है? आप अपनी गाड़ी से फर्स्ट क्लास जा रहे थे, कोई तकलीफ नहीं, एकदम मस्त; लेकिन आपके आगे आपसे बड़ी एक गाड़ी गई, फिर लोभ आ जाएगा — और जब तक आपसे छोटी गाड़ियां जा रही थीं, तब तक तकलीफ नहीं हुई। एक काम करो भाई — देख लो आपकी योग्यता है या नहीं; है तो लाओ, नहीं है तो छोड़ दो। मोह किससे होता है? जिससे मुझे मेरे तरीके से मिलता है, उससे मुझे मोह होता है। तो लेने का भाव छोड़कर देने का भाव करो, बस।

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