प्रश्नोत्तर P3-0088 · भाग 3
गृहस्थी में बैलेंस कैसे बनाएं — संन्यासी वाली सीधी बात पर हम एकदम नहीं आ सकते। क्या रिश्तों की बुनियाद में मुझे यह देखना पड़ेगा कि वहां मेरी जिम्मेदारी है या वह व्यक्ति मेरा पैसा यूज़ करके कुछ और कर रहा है? अगर जिम्मेदारी बनती है तो क्या पैसा न देखकर, अपने से बचाकर भी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए? (उदाहरण: किसी का टिकट कराया — क्या उससे स्तर उठता है?)
गृहस्थी में मुझे यह देखना चाहिए कि अगर वह मुझसे कोई ताकत ले रहा है — चाहे वैभव हो, चाहे मेरी समझ, चाहे मेरे शरीर की ताकत — तो उसका उपयोग कहां कर रहा है। क्या अपनी जरूरत में कर रहा है, या ताकत लेकर वह गिर रहा है? अगर ताकत लेकर गिर रहा है तो चाहे खुश हो चाहे नाराज, उसे देना बंद कर दो। अगर ताकत लेकर उसका स्तर उठ रहा है तब उसकी सहायता करो। मुझे यह भी देखना है कि मैं किसी से ले रहा हूं तो उसका उपयोग किस तरीके से कर रहा हूं — दुरुपयोग या सदुपयोग। और सामने वाला कुछ ले रहा है, तो देने से पहले मुझे पता लगाना है कि वह इस ताकत का उपयोग करके गिरेगा कि उठेगा। उठेगा तो दो, गिरेगा तो मत दो — यही जिम्मेदारी है, यही कर्तव्य है।
टिकट कराने में भी देखना है कि वह जा कहां रहा है, और क्या उसकी सामर्थ्य नहीं थी। सामर्थ्य थी तो आपने क्यों कटाया? यह देखना है। प्रत्यक्ष उदाहरण है — इनका बेटा पुलिस में है, काश्तकार भी हैं, कोई कमी नहीं; फिर भी टिकट मैंने कराया और मुझे वापस भी नहीं लेना। क्यों कराया? क्योंकि जब मैं इनके यहां था तो ये मेरी अच्छे तरीके से सेवा करते थे, देखभाल करते थे। ये दें भी तो मैं न लूं — ये सक्षम हैं, परिवार भी सक्षम है। तो मैंने कराया, क्योंकि उसके पीछे मुझे भी कुछ मिला था; नहीं मिला होता तो मैं क्यों बोलता कि तुम आओ, आते तो अपने टिकट से आते। जब मैं कुछ करता हूं तो देखता हूं — मैं क्यों कर रहा हूं? क्या उसके पास नहीं है? है तो फिर क्यों? कहीं मैं अपने मान के चक्कर में तो नहीं कर रहा कि मुझे बड़ा बनना है, गांव जाएं तो लोग बोलें कि देखो इसने भेजा?
इनको चित्रकूट कार से घुमाया — क्यों? हमारे परिवार में भी लोग थे, उन्हें क्यों नहीं घुमाया, इन्हें क्यों? अगर इन्होंने मेरे लिए कुछ किया तो मैं जिस लायक हूं, मैंने इनके लिए किया — लेनदेन तो है। हमारे भाई लोग आने को बोलते हैं तो मैं बोल देता हूं — आना तो, नियम मेरा, नहीं तो भगा देंगे। और इनको मैंने कोई नियम नहीं बताया — बस तुम चले आओ, नियम में हम तुम्हें रखेंगे, नियम तुम्हें नहीं बताएंगे। यह प्रेम है, क्योंकि मुझे मालूम है यहां आने से तुम्हारा स्तर उठेगा। मैं इनके घर पर था; इनके बच्चे मुझसे बड़े हैं, फिर भी इन्होंने इतने सम्मान और इज्जत से रखा, पूरा परिवार मेरे पीछे लगा रहता, गाड़ी में पेट्रोल भरा देते। कोई उम्मीद नहीं रखते थे — आंख से पता चलता है।
अगर आपके जीवन में किसी ने आपके लिए कुछ किया है और आप आगे बढ़ो, तो जिंदगी जब मौका दे, आप उसके लिए करो — वह न बोले तो भी करना। तब दायरा, तुलना, पैसा, ताकत मत देखना; मूल्य मत देखना; और सबसे अच्छा करो, जिस लायक आप हो। मैंने टिकट फर्स्ट क्लास में कराया, जहाज का भी खोज रहा था — यह मेरा शौक था कि ये जहाज से आएं-जाएं। यही लेनदेन है, हम एक दूसरे के पूरक हैं।
एक बार मुझे कोई मेरठ ले गया। लौटते वक्त मैंने कहा फ्लाइट का देख लो; उसने ट्रेन का देखा, और उसमें भी थ्री-टायर — जबकि उसकी पेंशन अच्छी है, करोड़पति है, रेलवे में था। मैंने कहा — तू मुझे लाया और थर्ड क्लास में भेज रहा है, तो जिंदगी ने मुझे मौका दिया तो तेरे लिए भी थर्ड क्लास ही चुनूंगा। अगर वह गरीब होता तो मैं ये बातें नहीं कहता — जब सामर्थ्य ही नहीं है तो क्या करेगा। लेकिन जब आप किसी को ले गए तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही भेजना चाहिए। बदले में हमेशा आदमी ज्यादा ही करता है — तुम जितना देते हो, सामने वाला ज्यादा देता है; बुरा किए हो तो बुरे में भी ज्यादा देगा — एक थप्पड़ का दो थप्पड़। यह प्रकृति का नियम है। तो अगर किसी ने आपके लिए किया है और जिंदगी मौका दे तो जरूर उसके लिए करना, वह न कहे तो भी करना — बस यह देख लेना कि उसके हित का है, इससे वह आगे बढ़ेगा।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 14 जून 2026 #योगी · 2026-06-14