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प्रश्नोत्तर P21-0099 · भाग 21

गुरु जी, मैं सोचती हूं यह घर छोड़कर कुटिया चली जाऊं और वहां सत्संग-सेवा करूं; पर वहां अपनी मेहनत का नहीं, दूसरों के दिए अन्न का खाऊंगी और पैरों तले जीव भी मरते हैं — क्या इससे मेरा बंधन बनेगा? आत्म-कल्याण के लिए घर पर रहूं या कुटिया जाऊं?

"अपने घर चल" कहने का मतलब मैं कुटिया के लिए नहीं बोलता, मैं तेरे उस घर की बात करता हूं जहां से तू आई। तू चाहे इस घर में रहकर साधना कर, चाहे वहां। वहां व्यवस्था सत्य के खोजियों के लिए है, और वहां भी बहुत काम है — पेड़ों को पानी देना; अगर पेड़ को पानी दे रही है और भोजन कर रही है तो उसकी भरपाई कर दी ना तूने। जितना खा रहे हो वो प्रकृति करवा लेगी आपसे। कुटिया में रहेगी तो 24 घंटे साधना होगी; घर की रस्सी में साधना करेगी तो 24 घंटे थोड़ी होगी। तो देख ले तुझे कितना जल्दी जाना है — घर में व्यवस्था हो तो घर पर रह; कुटिया में निशुल्क आजीवन व्यवस्था है, वहां लगता है तो वहां चली जा।

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