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प्रश्नोत्तर P21-0081 · भाग 21

गुरु जी, कबीर साहब की वाणियां इतनी हैं और कई जगह एक-दूसरे से उलटी लगती हैं — जैसे "पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़" — तो हम किस वाणी को पकड़ें?

कबीर ने कहा पत्थर पूजने से हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़, लेकिन कबीर के गुरु रामानंद मूर्ति पूजक ही थे ना; मीराबाई को पत्थर पूजने से ही गुरु मिला, रामकृष्ण परमहंस को मां काली ही निमित्त बनीं और गुरु तोतापुरी मिले — तो अब किसको झूठ बोलोगे? इनको समझने के लिए इनके स्तर पर होना पड़ेगा। मैं उनकी वाणी की व्याख्या नहीं करूंगा, उसकी व्याख्या करने वाले बैठे हैं। अपनी बात करो, अपना विवेक जगाओ। चाहे कबीर हों चाहे गुरु नानक जी, उन्होंने कहा जीवंत गुरु ढूंढो। मैं तो कह रहा हूं ना मेरे चक्कर में पड़ो, ना कबीर के, ना गुरु नानक के — अपने चक्कर में पड़ो कि मेरा उद्धार कैसे होगा, क्योंकि उनके उद्धार से मेरा उद्धार नहीं होने वाला। इनकी वाणी पकड़ोगे तो उलझकर लड़ जाओगे। ज्ञान को पकड़ो, व्यक्ति विशेष को मत पकड़ो — ज्ञान पहुंचाएगा, व्यक्ति विशेष नहीं; पात्र को ना पकड़कर पानी को पकड़ो, प्यास बुझाओ और निकल जाओ।

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