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प्रश्नोत्तर P21-0070 · भाग 21

गुरु जी, जैसे शराबी को शराब की और जुआरी को जुए की ऐसी तड़प होती है कि वो परिवार-संसार किसी की तरफ नहीं देखता — वैसी तड़प हमारे अंदर आत्म-कल्याण के लिए क्यों नहीं बन पाती, जबकि आप इतना अच्छा समझाते हो?

देख, चाहे शराबी हो या जुआरी, पहले दिन तड़प नहीं बनी; धीरे-धीरे उसने ग्रहण किया, धीरे-धीरे आदी हुआ, अब इस स्थिति पर आ गया कि छोड़ नहीं सकता। पहले दिन तो उसने एंजॉय किया। वैसे ही धीरे-धीरे सत्संग सुनता रह, समझ में आता रहेगा। जीवात्मा की कहीं-न-कहीं तड़प बनी ही है — चाहे भोग में, चाहे योग में। तो तू धीरे-धीरे इस सत्संग को ग्रहण कर, इसका अनुसरण कर, इस पर चल — एक दिन ऐसा होगा कि आत्मिक कल्याण के बिना रह ही नहीं पाएगा; लेकिन ये तुरंत नहीं बनेगी। कहीं और अपने आप को ना लगाना; जैसे रोज भोजन कर रहा है इस शरीर के लिए, वैसे अपने लिए सत्संग सुनते रह, एक दिन भी छूटे ना — एक समय ऐसी स्थिति आएगी कि आत्मज्ञान के बिना रह नहीं पाओगे।

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