प्रश्नोत्तर P2-0185 · भाग 2
तो ज्ञान से पहले, जब भी ऐसी यादें सताएं, क्या मुझे यह समझ लेना चाहिए कि यह मेरे ही कर्मों का परिणाम था — उन्होंने जैसा बर्ताव किया, ठीक किया; गलती मेरी थी कि मैंने उनसे उम्मीद रखी?
गलत वे नहीं, गलत हम हैं। अपनी समझ से वहां से अपने आप को हटा लेना चाहिए, उस समय ज्ञान का उपयोग करना चाहिए — यह मेरे ही कर्मों का परिणाम है। अगर मेरे साथ दुर्व्यवहार हुआ, मैं उसमें लिप्त नहीं हुआ, मैंने अपनी आत्मरक्षा की — उसके बाद भी जितना हुआ, वह मेरे कर्म का परिणाम है।
जैसे मांडव्य ऋषि की कहानी है। वे एक जगह तपस्या कर रहे थे; सेना चोरों का पीछा कर रही थी, चोर चोरी का सामान उनके पास रखकर छिप गए। सैनिकों ने कहा — चोरों का सरदार यही है, माल यहीं छोड़ा है; पकड़कर राजा के पास ले गए। राजा ने कहा — सूली पर चढ़ा दो। पर हर बार सूली टूट जाती थी। राजा को बताया गया, तो वह आया — ये तो मांडव्य ऋषि हैं — और क्षमा मांगी। ऋषि बोले — राजन, अपराधी तुम नहीं, कोई और है; तुम्हारी क्या हिम्मत। फिर वे धर्मराज के पास गए, जो कर्मों का लेखा-जोखा करते हैं, और पूछा कि यह किस कर्म का परिणाम है। धर्मराज बोले — जब आप 12 साल के थे, तितली को कांटा चुभोते थे, उसका परिणाम है। ऋषि बोले — 12 साल के बच्चे को तो दोष ही नहीं लगता, फिर दंड कैसे दिया? धर्मराज ने गलती स्वीकार की, और ऋषि ने श्राप दिया, जिससे धर्मराज विदुर बने। कहानी न सच होती है न झूठ; हम उससे प्रेरणा लेते हैं — कि आपके साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह कहीं न कहीं मेरे ही कर्म का परिणाम है।
कर्म के सिद्धांत को समझना है: मुझे अपनी समझ से अपनी रक्षा भी करनी चाहिए — तुम समर्थ हो, तो अपनी रक्षा भी कर लो। किसी ने गलत किया, तो उसे दंड मिलना भी उसके कर्म का परिणाम है, तभी तो पूरा होगा। और मेरे साथ कुछ हुआ है, तो उसका जिम्मेदार मैं हूं — (मेरे कर्म के बिना) कोई ऐसा कर नहीं सकता।
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वीडियो: आखिर कब तक ये याद रहेगा ? #योगी · 2026-01-16