प्रश्नोत्तर P2-0178 · भाग 2
आपने कहा कि उपयोग तुमने किया है — पर अगर किसी की बचपन में शादी हो गई, तो उसे याद ही नहीं कि उसने कब उपयोग किया?
तो अगर आपको लग रहा है कि उपयोग नहीं किया, तो निकल लो — तब तुम्हें कौन पकड़ लेगा? कह दो कि बचपन में शादी हो गई, मुझे समझ नहीं थी, अब मुझे नहीं करना — बस, बात खत्म। कानून भी है; हर जगह स्वतंत्रता है — नौकरी है तो इस्तीफा है, विवाह है तो तलाक है। मुझे कहां रहना है, कहां नहीं, यह मैं तय करूंगा। अगर मैं अपने आप को विवश, मजबूर बता रहा हूं, तो इसका मतलब मुझे वहीं रहना है; बस कोई कह दे कि हां, तुम मजबूर हो, बेचारे हो — मेरी पूरी आसक्ति और मोह वहीं है और ऊपर से सांत्वना चाहिए। ऐसा कुछ नहीं है; नहीं करना है, तो नहीं करना है। जो बेड़ियां खुद बांधी हैं, वे खुद ही तोड़नी पड़ेंगी, चाहे आज हाथ कांप रहे हों।
इसलिए मैं कहता हूं — चाहे पुरुष हो या महिला, अपने आत्मिक कल्याण के लिए घर में रहकर ईमानदारी, सत्कर्म के साथ जीवन जियो। और कम से कम पूरा एक महीना एकांतवास में जाओ — अगर जीवंत गुरु मिल जाए तो गुरु के सान्निध्य में, नहीं तो किसी ऐसे आश्रम में जो पूरी तरह आध्यात्मिक हो; पहले पूरा समझकर ऐसी जगह खोजनी है। एक महीना पूरा एकांत में, पत्थर की मूर्ति की तरह रहना है — एक भी शब्द व्यावहारिक बातचीत नहीं। कोई पूछे कहां से आए हो, तो जवाब एक ही — यही पता लगाने आया हूं; नहीं तो पत्थर की प्रतिमा बन जाओ। जब जरूरतमंद की, सत्कर्म की बात आए, तो वहां लग जाओ, फिर अपने आप में स्थिर हो जाओ।
साधना स्थान पर एक भी शब्द व्यावहारिक बोला, तो आप राग-द्वेष में फंसे। एक शब्द का जवाब दिया, तो दूसरा आएगा; उसका जवाब नहीं दोगे, तो वह व्यक्ति आपके प्रति द्वेष बांध लेगा — पहले जवाब में राग बांधा, दूसरे में द्वेष। जवाब देते रहोगे, तो रसपान करने लगोगे; आपके तरीके से बोला तो अच्छा लगेगा, नहीं तो बुरा — दो में से एक परिणाम आएगा, और तुम फंस गए। इसलिए अपने आप को बचाकर रखना है, पत्थर की प्रतिमा बन जाना है — अगर अपना कल्याण करना हो तो।
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वीडियो: मेरे भाव को तू योगी ही समझ सकता है । #योगी · 2026-01-20