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प्रश्नोत्तर P19-0032 · भाग 19

गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद कोई कर्म बंधन में नहीं बंधता — तो जो पहला शरीर निर्विकार होकर परमात्मा के सामने खड़ा था, वह फिर कर्म बंधन में कैसे बंध गया?

शरीर थोड़ी बंधा है, आत्मा ही बंधी — शरीर ने कभी कहा कि मुझे भोजन दो? तुमने आज तक जितना किया, अपनी समझ से ही किया। सिगरेट पर लिखा है कैंसर होता है, दारू पर लिखा है — फिर भी पी रहे हो, तंबाकू खा रहे हो; तुम समझ के ही सारी गलतियां कर रहे हो। तुमने बेईमानी समझ के की — अपने स्वार्थ के लिए — तो भोगा कौन? विकार कौन धारण कर रहा है? तुम ही। गाली किसी ने नहीं सिखाई, पता भी है गलत है, फिर भी देते हो। बेसमझी में तो दंड ही नहीं — पागल को दंड नहीं, सुधार घर भेजा जाता है; समझदार करे तो दंड। आपका जीवन अशांत है तो आपके कर्मों से ही है। आत्मज्ञान के बाद भी विकार सामने आते हैं, पर वह समझ के उन्हें पकड़ता नहीं — वह अपने को जाल से निकाल चुका; फंसे तो समझ के ही फंस सकता है। जैसे मेरे पास (दान का) ऑप्शन आया, मैंने समझ के ना बोल दिया — हां भी कह सकता था। पहले फंसने में मेहनत, अब छोड़ने में उससे ज्यादा मेहनत — पर अभी ज्ञान मिला है तो अभी इसका उपयोग कर लो।

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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29