प्रश्नोत्तर P19-0022 · भाग 19
गुरु जी, आपकी परमानंद की यात्रा चल रही है या पूर्ण हो गई?
चल ही रही है, यह बोल सकते हैं; कितनी बाकी है नहीं बता सकते। रोक हमारी तरफ से ही है — हम इस काम में लग गए कि जाना तो पक्का है, क्यों ना जाते-जाते आप लोगों के लिए कुछ कर दूं; यात्रा बहुत तेज चली थी, मैंने धीमी कर दी, नहीं तो आपसे बात भी नहीं कर पाते। रोकने के लिए कुछ भाव बनाना पड़ता है — जैसे रामकृष्ण परमहंस सत्संग के बीच उठकर पत्नी से पूछते थे क्या बना रही हो; उन्होंने कहा जिस दिन पूछना बंद करूं, समझ लेना एक-दो दिन और; और वैसा ही हुआ। मुझे भी लोगों के कल्याण का लगाव रखना पड़ा; यह भाव अज्ञानता में ही बना लिया था कि घूम-घूमकर ज्ञान बांटूंगा, नहीं तो इस पृथ्वी पर रहने का कोई कारण नहीं। अज्ञानता में आदमी कामना और लोभ में धीमा होता है, अपने भोग, नाम-पैसा-शोहरत के लिए — वह ठीक नहीं; ज्ञान के बाद इंसान जगत के हित के लिए रुकता है, वही महान है।
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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29