प्रश्नोत्तर P18-0197 · भाग 18
गुरु जी, जब आपके पास लोग कम आते थे तो क्या आपने सोचा कि ज्ञान देने के लिए आवरण (वेश-भूषा) का सहारा लेना पड़ेगा? आपको इसका जवाब कैसे मिला?
मैं बहुत चिंतित था कि क्या मुझे भी आवरण का सहारा लेकर ज्ञान देना पड़ेगा, क्योंकि मेरे फटे-चिथड़े कपड़ों के कारण मुझसे जल्दी कोई बात नहीं करता था। एक दिन अदलपुरा में मंदिर के पास बैठा था, एक परिक्रमावासी युवक आया, अंदर ध्यान में बैठा और कुछ देर बाद आकर मेरे पैर पकड़ लिए — बोला ध्यान में किसी ने कहा "वहां जाओ, तुम्हें मार्ग मिल जाएगा"। वह पुणे का इंजीनियर था, आत्म साक्षात्कार के लिए निकला था; मैंने पूछा "कौन किसका आत्म साक्षात्कार करना चाहता है?" और उसके प्रश्नों के उत्तर दिए। उसी समय मुझे जवाब मिल गया — तुम्हें कुछ बदलने की, कपड़े या आवरण की जरूरत नहीं; जो मिला है वह बांटो, जिसको ज्ञान दिलवाना होगा मैं भेज दूंगा। उस दिन से कोई आवरण का टेंशन नहीं। यहां जितनी व्यवस्था है उसी के आदेश से है, सात्विक है और सबके लिए एक समान — एक टाइम भोजन है तो मैं भी एक ही टाइम करता हूं, जो आप बनाकर खाते हो वही मैं भी।
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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29