प्रश्नोत्तर P18-0145 · भाग 18
गुरु जी, क्या प्रियजनों (मां-बाप, पत्नी, बच्चों) के साथ भी हमें एक दायरा (सीमा) बनाना चाहिए और उन्हें साफ बता देना चाहिए — जैसे "आपकी इस बात से मुझे ठेस पहुंचती है, आप ऐसा न करें"?
हां, यह दायरा क्लियर-कट बनाकर बोलना चाहिए, लेकिन उचित तरीके से — इतना सीधा मत बोलो कि उन्हें चोट लगे; अपनी बात रख दो कि मैं आपके लिए इतना कर सकता हूं। बोलने का माहौल कैसा है, वह सुनने के लायक है या नहीं, यह देख लेना। अगर फिर भी वे करें तो उनका त्याग कर दो। अगर उनके बजाय अपने उस भाव का त्याग करोगे (झेलते रहोगे), तो अपने आप को धोखा दोगे — अंदर उनके लिए द्वेष और घुटन पैदा हो जाएगी। इसलिए बोल देना ही ठीक, और त्याग कर देना ही ठीक। त्याग इसलिए कि त्याग से वे समझ जाएं — अगर कोई बिगड़ रहा है तो साथ रहने का क्या मतलब; हो सकता है दूर जाने के बाद सुधर जाए; आंखों में आंसू भी हों तो भी त्याग करके निकल जाओ और परिणाम देखो। अगर भाव का त्याग करके झेलते रहे, तो वे सुधर नहीं पाएंगे, और उनके बिगड़ने के जिम्मेदार आप होंगे — क्योंकि बात आपकी समझ में आ गई थी, उनकी नहीं। त्याग ही परम सुख है।
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वीडियो: जब मैं छोटे दायरे को तोड़ा ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-12-22