आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P18-0111 · भाग 18

गुरु जी, जब हम खोजी बनकर आध्यात्मिक मार्ग पर निकल जाते हैं, तो पत्नी-बच्चे जैसे अपने प्रेम वाले लोगों को दर्द होता है — क्या यह स्वार्थ (सेल्फिशनेस) नहीं है? क्या कोई और तरीका है?

अध्यात्म का मतलब है अपने आप को सुधारना और सुधार कर स्वयं का आत्मदर्शन करना। अब देखना यह है कि आप किस स्थिति में घर छोड़ते हो। स्थितियां दो होती हैं — एक अपने कल्याण के लिए, एक समाज कल्याण के लिए। अगर समाज कल्याण के लिए निकलते हो तो आपको दोष नहीं लगता, और अपने कल्याण के लिए निकलते हो तो दोष लगता है। दुख तो परिवार को पहुंचेगा, लेकिन धर्म कहता है — शरीर बचाने के लिए हाथ देना पड़े तो दे दो, परिवार बचाने के लिए एक सदस्य, गांव के लिए एक घर, देश के लिए एक राज्य, विश्व के लिए एक देश हटाना पड़े तो हटा दो। आप किसके लिए निकल रहे हो, यह मायने रखता है। बस अपने कल्याण के लिए निकलना है तो वहीं रहकर करो, उनको साथ लेकर चलो; जगत कल्याण के लिए निकल रहे हो तो निकलो। मैंने यह खुद अपनाया — युवा होने पर देखा कि शादी करूं तो पत्नी, बच्चे, बंगले, कारें, और कुछ लोग इस शरीर का उपयोग करेंगे, जिंदगी खत्म; शरीर तो हर स्थिति में जाना है, तो क्यों ना समाज इसका उपयोग कर ले।

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वीडियो: जब मैं छोटे दायरे को तोड़ा ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-12-22