प्रश्नोत्तर P18-0061 · भाग 18
गुरु जी, जीवन अनित्य है, जगत अनित्य है, विचार चंचल और अनित्य हैं, जीवात्मा शाश्वत सत्य है — उसे निज स्वरूप में कैसे पहुंचाएं, और व्यवहार में यह कैसे हो?
बस रूप को छोड़ दो, निज स्वरूप में पहुंच जाओगे। शब्दों में कह देना आसान है; व्यवहार में करना है तो रसपान करना छोड़ दो। रसपान है — ऐसे शब्द सुनना जो सुख देते हैं, दृश्य देखना, सुगंध-दुर्गंध के चक्कर में, स्वाद के चक्कर में, स्पर्श में — पांचों इंद्रियों से रस लेना। बीच-बीच में जो हिलोरें आती हैं, यानी रसपान की इच्छा जग जाती है, उसे देखो कि कहां रसपान में लगे हो — यह आप ही को देखना है। रसपान ही तो बात करवा रहा है। भोजन शरीर की आवश्यकता के रूप में खाओ, जुबान की तृप्ति के लिए खाओगे तो रस रहेगा। जो जुबान को रुचिकर लगे वह नहीं खाना।
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वीडियो: आत्मज्ञान किस स्थिति में होता है ? #aadhyatmik_satsang #livesatsang #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2025-01-03