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प्रश्नोत्तर P18-0007 · भाग 18

गुरु जी, आपका संक्षिप्त परिचय दीजिए — आपकी यात्रा कहां से और कैसे शुरू हुई?

जन्मभूमि उत्तर प्रदेश, रहना ज्यादातर मुंबई में। बचपन से समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी — मान-सम्मान के लिए भी। करते-करते समझ आया कि संसार में एक-दूसरे को मानते हैं तो वहां लेनदेन है; लेनदेन नहीं तो कोई किसी को नहीं मानता। फिर ज्योतिष हुआ — उसमें भी लगा कि यह पूर्ति नहीं, बस नाम-शोहरत-पैसा है। फिर संन्यासी हुआ, उस समय सच में कुछ नहीं चाहिए था; पर आश्रम में तीन दिन रहकर देखा कि जो छोड़कर आया, उससे ज्यादा पंचायत तो यहां है। गुरु ने कहा "धीरे-धीरे होगा", फिर "माता के पास बैठ, 41 दिन में बता देगी" — मैंने कहा पहले पक्का करो कि मैं 41 दिन जीवित रहूंगा, और बाद में मत कहना कि भाव से नहीं बैठा। उन्होंने कहा "तू विवेकानंद नहीं" — मैंने कहा आपने पक्का कर दिया कि आप रामकृष्ण नहीं, पर मैं विवेकानंद जैसा हूं — अबोध, भटका हुआ, अशांत, मुझमें काम-क्रोध-मद-लोभ सब है, पर इस कमी को निकालने के लिए किसी हद तक जा सकता हूं। फिर 12 (बल्कि 14) ज्योतिर्लिंग, चार धाम, गंगासागर की यात्रा की। जहां भी गया, वही रामायण-गीता की बातें, या "जन्म-जन्म लगते हैं, यह महापुरुषों को होता है" — ये आत्मविश्वास तोड़ने वाली बातें हैं। जब सब एक ही ब्रह्म से है तो मैं महापुरुष क्यों नहीं? महापुरुष भी होने से पहले वैसे ही भटक रहे थे। तत्व एक ही है, बस बोध का अंतर है — किसी ने समझा, किसी ने नहीं समझा। पर पक्का था: कुछ मिले या न मिले, मरना भी पड़े, मुझे आत्मज्ञान तक पहुंचना है।

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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25