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प्रश्नोत्तर P17-0105 · भाग 17

गुरु जी, आईने में अपना चेहरा तो शरीर का दर्शन है — असली आत्मदर्शन कैसे हो, उसका सरल मार्ग बताइए। इसमें गुरु की क्या भूमिका है?

गुरु दर्पण है, गुरु शब्द है — तो शब्दों को लेकर दर्शन कर लो। दर्पण में दर्पण नहीं दिखता, उसमें तुम ही दिखते हो; इसलिए गुरु को नहीं देख पाओगे, गुरु में अपने आप को ही देखो — वह तो रहा ही नहीं, देखने के लिए बचा ही नहीं। गुरु वही होता है जो आपसे आपका मिलना करा दे — "मुझको मुझी से मिला दे"।

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