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प्रश्नोत्तर P17-0047 · भाग 17

गुरु जी, हमने कबीर पंथ में पढ़ा कि मन को बुरा बना रखा है — मन को ज्योति निरंजन, काल कहा जाता है, और "अपना रूप पहचान" जीव को कहा जाता है। आप कहते हैं मन सबसे सहायक है — ये कैसे?

मन ना पवित्र है ना अपवित्र, उससे ऊपर है। मन इंगित करता है — आपको बाथरूम लगी तो मन बताएगा, नहीं करोगे तो चड्डी में हो जाएगा; मन आपकी जरूरत बताता है, अब जीव जाकर करे तो ठीक, नहीं करे तो आपकी मर्जी; जब काम हो जाएगा तो मन इंगित करना छोड़ देगा। भूख लगी तो मन बताता है, खा लिया तो मन भोजन पर जाएगा ही नहीं जब तक दोबारा भूख ना लगे। "मेरा मन शराब पीने का कर रहा है" — मन नहीं कर रहा, जीव को पीनी है, आपने पहले पी है, मन बस बता रहा है कहां मिलेगी, कैसे मिलेगी; वो सबसे वफादार है — अच्छा करो चाहे बुरा, रोकेगा नहीं, बताएगा; और गलत काम करके पछताता कौन है? जीव। जैसे मोबाइल-कंप्यूटर में एरो — सबकी जगह है, एरो की जगह नहीं; माउस चलाओ तो तुरंत आता है; एरो कभी नहीं कहता "ये देखो", जीव डिसाइड करता है; एरो के द्वारा ही सब लाए हो और एरो के द्वारा ही डिलीट भी कर सकते हो — "चाहिए" में भी मन से गए, "चाहिए" से मुक्त भी मन के बिना नहीं हो सकते। मन रुक जाए तो ब्रेन हैंग — कुछ कर ही नहीं पाओगे। विचार भी मन से नहीं, देश-काल-परिस्थिति से निकलते हैं — गटर आया तो गटर का विचार आया, आंखों ने देखा। लोगों ने मन को विलन बना दिया, बदनाम कर दिया, खुद को बदनाम नहीं कर पाए — हर व्यक्ति करता खुद है, दोष मन को दे देता है। मैं थोप नहीं रहा, प्रत्यक्ष बता रहा हूं — उधर जो बोला गया और इधर जो समझा, जिससे आपका कल्याण हो वो उठा लो और निकल लो; पहले एक ही ऑप्शन था, अब दो हैं — अपनी समझ से चुनाव करो। मैं ये नहीं कहता उसे छोड़ो, इसे पकड़ो; ज्ञान किसी व्यक्ति विशेष का नहीं होता, जिसने समझा उसका हुआ। मेरा भाव बस इतना है कि आपका कल्याण हो, कहीं से हो जाए; आपका एक-एक क्षण भी खराब ना हो — और आप उनके मार्ग पर भी चलोगे तो भी मैं अपनों की कुटिया में आपकी सेवा करूंगा।

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वीडियो: आत्मज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी में क्या भेद है | मन क्या है / #आत्मज्ञानी #ब्रह्मज्ञानी #aadhyatmik · 2024-09-04