प्रश्नोत्तर P17-0023 · भाग 17
आपका भाव रहता था कि मैं जो भी कर रहा हूं — खाना, सोना, रोना, बात करना — मैं अपने लक्ष्य की तरफ ही पहुंच रहा हूं। तो अगर हम पथिक भी अपनी पूरी दिनचर्या में, ईमानदारी और सत्कर्म करते हुए, ये भाव रखें कि जो कुछ मेरे शरीर से, मन से, कल्पना में, डर में हो रहा है, उसका निचोड़ यही है कि मैं अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूं, कि मेरा गुरु देख रहा है — तो ये मेरे लिए कितना कारगर होगा?
पूरी तरह। बस देखना ये है कि सच में मुझे उस काम के बदले कुछ नहीं चाहिए, बाहर से मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं इस काम को कर रहा हूं तो अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूं — आत्मज्ञान की तरफ, अपने आप की तरफ, अज्ञानता से ज्ञान की तरफ; मेरी समझ विकसित हो रही है। अगर मुझे काम मिला है तो सामने वाले की जरूरत समझ के कर रहा हूं; प्रकृति ने मुझे मौका दिया है। लेकिन सच में इसके बदले मुझे कुछ नहीं चाहिए — ये आप कह पाओ अपने आप से। मैं कह पाता था कि मुझे आत्मज्ञान के अलावा कुछ नहीं चाहिए; हर कार्य उसी के लिए करता था — मुझसे कोई कुछ भी करवा ले, बस मुझे आत्मज्ञान हो जाए; मैं इस दुनिया में सबके बिना रह सकता हूं, इसके बिना नहीं; इसके बिना मैं अधूरा हूं। हफ्तों सोया भी रहूं तो सोने में यही चलता रहता था कि बस मुझे आत्मज्ञान हो जाए। इस भाव को मैंने एक पल भी कभी छोड़ा नहीं।
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