प्रश्नोत्तर P17-0011 · भाग 17
योगी जी, आप कहते हो दो ही रास्ते हैं — शरीर के लिए जी लो, जिसकी जरूरतें बहुत जल्दी पूरी हो सकती हैं, या आत्म-कल्याण। तो इस दूसरे रास्ते की तरफ हम पूरे वेग के साथ क्यों नहीं बढ़ पाते?
इसलिए कि इसमें आपको प्रपंच नहीं मिलता। आपको प्रपंच की आदत पड़ गई है — गप मारना, सड़ाका मारना। पूरा खाली समय है, गप मारोगे लेकिन अकेले जाके एकांत में नहीं बैठोगे; बोलोगे घुटन हो रही है, बोर हो रहा है। रस भरी बातें चाहिए, कोई आपका मान बढ़ाए। आप जीवन को बहुत गहराई से समझो — इस शरीर के द्वारा मैं क्या-क्या कर सकता हूं? अगर कोई भी पद पा लूं तो उस पद से पैसा ही आएगा ना; आखिरी परिणाम क्या है? ऐसा भी नहीं कि आप किसी को परमानंद दे पाओगे, क्योंकि खुद के पास नहीं है — उल्टा अपनी मूर्खता में उसे और फंसा लोगे। तो मैं कह रहा हूं, अगर पेट की, रहने की और कपड़े की व्यवस्था हो गई तो बात खत्म — फिर अपना आत्मिक कल्याण करो। बस वो व्यवस्थाएं ईमानदारी से मिलनी चाहिए।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11