प्रश्नोत्तर P16-0183 · भाग 16
आपका प्रत्यक्ष ज्ञान क्या कहता है — अभी मेरे सारे उपकरण हेल्दी हैं, पर जब तक मैं अतृप्त हूं, आसक्त हूं, प्यासा हूं, तब तक यह बात समझ में भी नहीं आएगी; और जब तक रस नहीं निचोड़ा, कोई ताकत मुझे रस लेने से रोक नहीं पाएगी। मेरी इतनी जिंदगी बर्बाद हो गई, ऊर्जा खत्म हो गई — तो अब मैं यह बात कैसे समझूं?
अब अपने आप के अंदर प्रश्न खड़ा करना है कि यार इतने दिनों से तो भोग रहा हूं, क्या मिला? यहां लाके अपने आप को खड़ा करना पड़ेगा। अगला-पिछला जन्म छोड़ दो — मैं जब से समझने लायक हुआ हूं, इसका रसपान कर रहा हूं, मुझे क्या मिला? क्षणिक सुख, फिर मैं वहीं खड़ा हो जाता हूं; और देखा जाए तो मैं पहले से ज्यादा दुखी हो गया। जितना मैं रस भोगता गया, उतना कलह ही मेरी जिंदगी में आता है, क्योंकि जिसका मैं रस ले रहा हूं उसकी जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर आ रही है, और उसे पूरा करने में मुझे बेईमानी करनी पड़ रही है। जब जीव भोग से मुक्त होना चाहेगा तो अपने आप को देख पाएगा कि मैं इस वक्त कहां खड़ा हूं, और 20 साल पहले कहां था, जब ये लोग मेरी जिंदगी में नहीं थे। जैसे-जैसे रस भोगा, वैसे-वैसे फंसता गया; जितने लोगों का रस भोगा, उतनों की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई, और आज यही लोग मेरे कलह का कारण बन गए। इन्हीं की वजह से मुझे बेईमानियां करनी पड़ीं, चापलूसी करनी पड़ी; इस भीड़ ने मेरे स्तर को गिरा दिया। अरे, ये भीड़ इसलिए आई क्योंकि मैंने रस का चटकारा लिया — मैंने लिया भी, दिया भी; नहीं दिया होता तो भीड़ नहीं खड़ी होती, सामने वाला आप पे इल्जाम ठोक देता। तो अब भोग छोड़ने का, त्याग का भाव लाना पड़ेगा कि नहीं यार, अब बस। अगर मैं इस रस को लूंगा भी तो छोड़ने के भाव से, क्योंकि रस का मैं आदी हो गया हूं, तुरंत नहीं छूट जाएगा। अगर व्यक्ति की स्थिति है कि एक झटके में तोड़ दे तो बात अलग है — जैसी वाल्मीकि जी की थी, एक झटके में छोड़ दिया। अब आपकी स्थिति पे, मनोदशा पे निर्भर करता है — या तो तुरंत छोड़कर निकल जाओ, या धीरे-धीरे समझ-समझकर छोड़िए, क्योंकि कुछ व्यक्तियों की जिम्मेदारी एकदम नहीं होती, कुछ की होती है। तो देखना है कि जीव किस स्थिति में खड़ा है, उस स्थिति में सोच-समझ के फैसला ले और अपना आत्मिक कल्याण करे। भोग से मुक्ति का भाव लाना पड़ेगा, तब कुछ हो सकता है।
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वीडियो: खुद को जांच ने का तरीका #योगी · 2026-02-20