प्रश्नोत्तर P16-0077 · भाग 16
आप 100 कमरे बनाना चाहते हैं — यह सब आपकी इच्छा है। आप कहते हैं कि हमारी कोई इच्छा नहीं है। कृपया बताएं।
इच्छा नहीं, जरूरत है — आप लोगों के लिए; जब यहां आओगे, समझ में आ जाएगा। यह कुटिया बनाई तो सोचा इतना काफी है, फिर कम पड़ने लगी, लोग बरगद के पेड़ के नीचे सोने लगे; अब हॉल बन रहा है, और मुझे पता है कि हॉल भी कम पड़ेगा। पहले एक शौचालय बनाया, फिर बुजुर्ग आने लगे जिनसे बैठा नहीं जाता, तो दूसरा बनाया। मैं पेड़ के नीचे बैठा होता और कहता यहीं सो जाओ, तो आप एक-दो दिन से ज्यादा नहीं रुक पाते; कंबल, पंखा, बाल्टी-लोटा — क्या-क्या घर से लेके आते? इसलिए हर व्यवस्था करनी पड़ती है — जरूरत में यह काम हो रहा है। बुद्ध ने भी चौमासे के लिए जमीन मांगी, एक व्यक्ति ने अपना सब बेचकर उस पर स्वर्ण मुद्राएं बिछवा दीं — सब ने ज्ञान के प्रचार के लिए समाज से लिया है। अगर कोई यहां आ रहा है तो मेरा कर्तव्य है उसे व्यवस्था देना। अतिथि देवो भव — अगर आप यहां आकर खुद बाजार से कंबल या राशन लाएं, तो मुझे यहां रहने का अधिकार नहीं; इसलिए किसी को यहां कुछ लाने नहीं देता, आपको क्या चाहिए मुझसे बोलिए। बस आप आत्मिक कल्याण के लिए साधना करो; जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाना ही साधना है। मैं तो 12 साल ऐसे ही घूमा — ना कभी हाथ में झोली ली; जहां मिल गया मिल गया, नहीं मिला कोई बात नहीं; दिसंबर-जनवरी में नदी किनारे पत्थरों पर कांपते-कांपते रातें बिताईं। व्यवस्था जरूरत में की जा रही है।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: कोई प्रश्न ना होने के बाद कौन सा प्रश्न होना चाहिए ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-06-16