आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P15-0019 · भाग 15

पहले मैंने गुरुओं से नाम-दीक्षा ली, वो ज्ञान भी देते थे, पर पूरा नहीं लगा, इसलिए आपके पास आया हूँ।

अगर हमें प्यास लगी और एक आदमी ने कहा मैं पानी पिलाता हूँ, और उसके पानी पिलाने के बाद भी हम कह रहे हैं मुझे प्यास लगी है, तो मतलब उसने पानी नहीं पिलाया, बस पानी पिलाने का भ्रम था। मैं भी खोजी था। अगर मैं किसी के पास गया और वही खोजने फिर आगे जा रहा हूँ, तो इसका मतलब उससे नहीं मिला। किसी को पकड़िए मत; पकड़िए अपने आप को, ज्ञान को और समझ को। लेकिन ईमानदार रहो — मिला तो मिला, नहीं मिला तो नहीं मिला, इतनी ताकत होनी चाहिए बोलने की। ज्ञान किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं होता, गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है। जैसे बिजली हर जगह अलग-अलग बल्ब में जल रही है पर स्रोत एक है, पानी के नल अनेक हैं पर पानी एक जगह से आ रहा है, वैसे ही ज्ञान एक ही जगह से उतरता है, निमित्त अनेक हो जाते हैं। ना राग में फँसना है ना द्वेष में, अपना आत्मिक कल्याण करके निकल जाना है। आखिर में गुरु भी छूट जाएगा — जैसे एक काँटा धँसा तो दूसरे काँटे से निकाला और दोनों को फेंक दिया। ज्ञान भी छूटेगा तभी पहुँचोगे; अज्ञान छोड़ के ज्ञान पकड़ लिया तो भी नहीं पहुँच पाओगे, दुकान खोले बैठे रहोगे। ज्ञान का उपयोग करके अपने आप को निकाल लो, फिर ये ज्ञान भी तुमको छोड़ देगा, तब बुद्धिमान हो।

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वीडियो: इतनी पूजा पाठ भक्ति करते हैं लेकिन दुख क्यों आते हैं ? #प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #आध्यात्म · 2026-08-10