प्रश्नोत्तर P1-0189 · भाग 1
आपने बात बता दी और समझ भी ली, लेकिन कुछ न कुछ संशय तो रह ही जाता है, जाता नहीं।
देखना है कि संशय कहां है। संशय चलने में है ना, मार्ग में तो नहीं? मार्ग में नहीं है, तो फिर संशय नहीं है। कहीं न कहीं मैं लिप्त हूं, अपनी किसी आदत से मजबूर हूं; मुझे वह आदत छोड़नी है। यह संशय नहीं है। संशय तो आपके अलावा किसी और पर होगा। आप पर आपको कभी संशय उठ ही नहीं सकता, क्योंकि आपको अपनी ताकत, अपनी समझ का सब पता है; आप कहां लिप्त हो, यह भी पता है। संशय सिर्फ एक जगह उठेगा — मार्ग पर। और मार्ग में कोई संशय नहीं है। तो कहीं न कहीं लिप्त हो, आपकी कोई कमजोरी है जिसे समझने के बाद भी छोड़ नहीं पा रहे हो। इसे संशय नहीं बोलेंगे।
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वीडियो: मुझे दान चाहिए ही नहीं #योगी · 2026-10-04