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प्रश्नोत्तर P1-0150 · भाग 1

गुरु जी, यह तो विरोधाभासी हो जाएगा — क्या कोई संत घर-परिवार में रहकर भी सिद्धि प्राप्त कर सकता है?

किसका? कोई नाम लो। राजा जनक — वे बचपन से शास्त्रार्थ करवाते थे, बचपन से लगे थे, और सत्य तक पहुंचने के लिए उन्होंने सब कुछ दे दिया, अंत में सब कुछ छोड़ दिया, अष्टावक्र के साथ चले गए। अष्टावक्र ने तो जबरदस्ती भेजा कि जाओ राज्य संभालो, वे तो वापस ही नहीं आ रहे थे — पूरी तरह छोड़ दिया था। लोग उदाहरण देते हैं कि बहुत से संत घर में रहकर भी उपलब्ध हुए। तो आप देखो, उन्हें बच्चों-पत्नी से मतलब नहीं था। घर में खाने को नहीं था, बच्चे भूखे मर रहे थे, न पढ़ाई न लिखाई — कोई मतलब ही नहीं था; इस स्थिति में रहते थे। किसी का भी नाम ले लो — घर में राशन है कि नहीं, कोई मतलब नहीं; बहुतों ने बाद में संन्यास लिया। तो मैं यह कहना चाहता हूं कि भैया, एक समय ऐसा आएगा कि निकलना पड़ेगा। घर में हो भी, तो घर से कोई मतलब नहीं, कोई लेना-देना नहीं।

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